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फेसबुक पर लाइक भले मिले, काम तो वोट आता है

Updated at : 02 Oct 2015 2:28 AM (IST)
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फेसबुक पर लाइक भले मिले, काम तो वोट आता है

गिरींद्र नाथ झा चुनाव के दौरान हर कोई अपनी बातें रखता है. पार्टी के लोग पार्टी की बातें करते हैं, जिन्हें टिकट मिलता है वे विकास की बातें करते हैं, जिन्हें टिकट नहीं मिलता वे पार्टी की बुराई करते हैं. मतलब हर कोई राजनीतिक अलाप में जुट जाता है. ऐसे में आपका यह किसान चुनाव […]

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गिरींद्र नाथ झा
चुनाव के दौरान हर कोई अपनी बातें रखता है. पार्टी के लोग पार्टी की बातें करते हैं, जिन्हें टिकट मिलता है वे विकास की बातें करते हैं, जिन्हें टिकट नहीं मिलता वे पार्टी की बुराई करते हैं. मतलब हर कोई राजनीतिक अलाप में जुट जाता है. ऐसे में आपका यह किसान चुनाव की बातें गाम-घर की धूल उड़ाती सड़कों के बहाने करते रहना चाहता है. मैं केवल राजधानी पटना की बातें नहीं करना चाहता, वहां से कोसों दूर चौक-चौराहों, गांव-घर की बात करना चाहता हूं. पटना को देखने सुनने वालों को देहाती दुनिया की चुनावी लीला सुनाना चाहता हूं.
लोगबाग इन दिनों जिला मुख्यालयों से गांव की तरफ जाने वाली सड़कों की बात करना चाहते हैं. पूर्णिया जिला के कृत्यानंदनगर प्रखंड के रामपुर इलाके में हमारी मुलाकात मोहम्मद इरफान से होती है. वे बताते हैं किस तरह पगडंडी ही उनका रास्ता है. मतलब विकास का गणित गांव में क्या मायने रखता है, इस पर सोचने की जरूरत है. चिमनी बाजार के बुजुर्ग रइस के सवाल को भी सुनने की जरु रत है. वे पूछते हैं- बाबू, इस बार मुसलमान मुख्यमंत्री बनेगा क्या? रइस चाचा के सवाल को सुन कर हमने दिमाग पर जोर दिया तो पता चला कि बिहार में अबतक मुसलिम मुख्यमंत्री एक ही बने हैं-अब्दुल गफूर.
चुनाव के दौरान जब आप यात्रा करते हैं और लोगों से बात करना चाहते हैं तो
पहली बार तो कई लोग कन्नी काट लेते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे खुलने लगते हैं. अररिया जिले के रानीगंज बाजार में एक किसान से बात हो रही थी. हमने पूछा कि माहौल कैसा है? उनका जवाब था- गर्दा! अब मैं सोचने लगा कि चुनाव में गर्दा किसका उड़ेगा! दरअसल राजनीतिक सवालों पर लोग खुलकर नहीं बोलना चाहते हैं.
रानीगंज एक बड़ा बाजार है. यहां के चाय दुकान पर बातचीत के दौरान लोगबाग प्रत्याशियों की चर्चा कम और चुनावी नारे की बात ज्यादा कर रहे थे.
लोगों की बातें सुनकर यह अंदाजा तो जरु र लगा कि इस बार राजनीतिक दलों के ब्रांड मैनेजरों के काम पर भी लोगों की नजर है. यहां एक युवक परितोष कुमार से मुलाकात होती है.
वह फेसबुक पर सक्रिय है. परितोष ने कहा कि वह राजनीतिक दलों के फेसबुक पेज पर आता-जाता रहता है. वैसे दलों को सोशल नेटवर्क पर जितना लाइक मिल जाए,काम तो ‘वोट’ ही आता है. फेसबुक से चुनाव जीता नहींजा सकता.
शाम हो चुकी थी. रानीगंज से बौंसी आते वक्त एक महादलित बस्ती पर नजर जाती है कि तभी मन के भीतर अदम गोंडवी बज उठते हैं- आइए और महसूस कीजिए जिंदगी के ताप को .. जिस गली में भुखमरी की यातना से उबकर .मर गयी फुलिया बिचारी कल कुएं में डूबकर. वैसे चुनाव के वक्त भावुक होने का कोई फायदा नहीं है.
अररिया जिला में बौंसी आता है. यहां से पूर्णिया जिले की सीमा 10 किमी है. चुनाव के वक्त वाहनों की चेकिंग बहुत ज्यादा होती है. पुलिस मुस्तैदी से अपना काम कर रही थी. चेकिंग के दौरान जहां हम रुके थे वहां एक मोटरसाइकिल सवार ने कहा-यदि ऐसी मुस्तैदी हमेशा पुलिस दिखाए तब यकीन मानिए बिहार बदल जाएगा.
चुनाव के वक्त मुद्दों के अलावा कई चीजों पर नजर जाती है. हम जिस सड़क सड़क से यात्रा कर रहे थे वहां कभी एक रानी हुआ करती थी- रानी इंद्रावती. पूर्णिय़ा गजेटियर में इसका उल्लेख है. उन्होंने इस इलाके में कुंआ, तालाब और सड़क को लेकर खूब काम किया था. चुनाव के वक्त इस इलाके में घुमते हुए मुङो रानी इंद्रावती के बारे में और जानने की इच्छा हो रही है, लेकिन अभी तो चुनावी बयार है. कहां इतिहास और कहां राजनीति ! बाद बाकी जो है सो तो हइए है.
(श्री झा पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद अपने पैतृक गांव में रहकर खेती-किसानी कर रहे)
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