बिहार के सकल घरेलू उत्पाद का चार प्रतिशत तक कर्ज लेने का हो प्रावधान : सुशील मोदी

Updated at : 20 Dec 2019 7:44 AM (IST)
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बिहार के सकल घरेलू उत्पाद का चार प्रतिशत तक कर्ज लेने का हो प्रावधान : सुशील मोदी

इस प्रावधान को लागू करने के लिए डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने केंद्र सरकार से की मांग पटना : राज्य के डिप्टी सीएम सह वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने वर्तमान आर्थिक सुस्ती को देखते हुए खपत बढ़ाने और मांगों को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र सरकार से कुछ विशेष प्रावधान करने की मांग […]

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इस प्रावधान को लागू करने के लिए डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने केंद्र सरकार से की मांग
पटना : राज्य के डिप्टी सीएम सह वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने वर्तमान आर्थिक सुस्ती को देखते हुए खपत बढ़ाने और मांगों को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र सरकार से कुछ विशेष प्रावधान करने की मांग की है. उन्होंने राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के तीन की जगह चार प्रतिशत तक कर्ज लेने की राज्यों को अनुमति देने को कहा है. साथ ही पिछले कुछ वर्षों के दौरान राष्ट्रीय लघु बचत ऋणों को समय पूर्व चुकाने या ब्याज दर कम करने, खुले बाजार में कर्ज लेने की साल के शुरू में ही अनुमति देने तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से डॉलर की जगह भारतीय मुद्रा में कर्ज उपलब्ध कराने की भी मांग की है.
राज्य को अतिरिक्त कर्ज लेने की अनुमति मिले मांग
डिप्टी सीएम कहा कि जीएसडीपी के तीन प्रतिशत तक कर्ज लेने की बाध्यता के कारण 2019-20 में बिहार 18 हजार 515 करोड़ का कर्ज ले पायेगा. अगर यह प्रावधान बढ़कर चार प्रतिशत तक हो जाये, तो छह हजार 171 करोड़ अतिरिक्त कर्ज लेने की सहूलियत के साथ 24 हजार 686 करोड़ का कर्ज ले सकेगा. इससे पूंजीगत व्यय बढ़ेगा, निर्माण कार्य में तेजी आयेगी और इसका असर बाजार की मांग में बढ़त के रूप में सामने आयेगा. पिछले वर्षों में राष्ट्रीय लघु बचत (एनएसएसएफ) से लिये गये 19 हजार 630 करोड़ के कर्ज पर राज्य सरकार को 9.5 प्रतिशत की दर से ब्याज देना पड़ रहा है, जबकि, अन्य स्रोतों से लिये गये कर्ज की औसत ब्याज दर मात्र 6.7 प्रतिशत ही है.
केंद्र या तो राज्य को लघु बचत से लिये गये कर्ज को समय से पहले वापस करने की अनुमति दे या उसकी ब्याज दर को घटा कर सात फीसदी करे. खुले बाजार से कर्ज लेने की सीमा और समय वित्त मंत्रालय तय करता है. अमूमन शुरू के नौ महीने में तो 75 प्रतिशत तय कर्ज को लेने की अनुमति मिल जाती है, परंतु आखिरी तिमाही में 25 प्रतिशत शेष कर्ज की अनुमति देने में वह आनाकानी करता है.
नतीजतन 2018-19 में बिहार को 19 हजार 184 करोड़ के स्थान पर महज 14 हजार 300 करोड़ ही मिला. इसलिए खुले बाजार से कर्ज लेने की एकमुश्त अनुमति प्रारंभ में ही राज्य को दिया जाए. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से राज्यों को डॉलर की जगह भारतीय मुद्रा में कर्ज दिलाने का केन्द्र सरकार प्रावधान करें. वर्षों पूर्व डॉलर मेें लिए गये कर्ज की वापसी डॉलर में करने के प्रावधान से उसके मूल्य में बढ़ोतरी होने से राज्यों को अतिरिक्त भार उठाना पड़ता है.
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