बैंकों के काउंटर से ही साथ लग जाते हैं रुपये छीनने वाले लुटेरे
Updated at : 08 Nov 2019 8:42 AM (IST)
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सुरेंद्र किशोर राजनीतिक विश्लेषक बैंक से पैसे लेकर लौटते समय ही अक्सर लूट होती है. दरअसल लुटेरा या उसका सहयोगी बैंक काउंटर के आसपास ही मड़राता रहता है. जैसे ही कोई व्यक्ति भारी रकम निकालता है,लुटेरे उसके पीछे लग जाते हैं. रास्ते में सूनसान स्थान मिलते ही लुटेरे झपट्टा मार लेते हैं. पटना तथा अन्य […]
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सुरेंद्र किशोर
राजनीतिक विश्लेषक
बैंक से पैसे लेकर लौटते समय ही अक्सर लूट होती है. दरअसल लुटेरा या उसका सहयोगी बैंक काउंटर के आसपास ही मड़राता रहता है. जैसे ही कोई व्यक्ति भारी रकम निकालता है,लुटेरे उसके पीछे लग जाते हैं. रास्ते में सूनसान स्थान मिलते ही लुटेरे झपट्टा मार लेते हैं. पटना तथा अन्य स्थानों में आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं.
अब सवाल है कि बैंकों के काउंटर तक लुटेरों की पहुंच कैसे रोकी जाए ? इसके लिए बैंक प्रशासन प्रवेश ‘नियंत्रित’ कर सकता है.ऐसी व्यवस्था के लिए राज्य पुलिस को बैंकों से तालमेल रखना पड़ेगा.पहचानपत्र के बिना बैंकों में प्रवेश वर्जित कर दिया जाये, तो ऐसी लूट कम हो सकती है. बैंक परिसर में प्रवेश करने वालों के पास कम- से- कम उस बैंक का पासबुक होना अनिवार्य बने.पासबुक पर फोटोग्राफ लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए.
सजा और प्रदूषण में आपसी संबंध
देश के सर्वाधिक 15 स्वच्छ नगरों में केरल के दो नगर शामिल हैं. इसके विपरीत देश के 15 सर्वाधिक प्रदूषित नगरों में बिहार के दो नगर शामिल हैं. बिहार में सामान्य अपराधों में सजा का प्रतिशत सिर्फ दस है. बिहार का यह प्रतिशत देश में सबसे कम है.केरल में सजा का प्रतिशत 84 है.
यह प्रतिशत देश में सर्वाधिक है.पूरे देश में औसतन सजा का प्रतिशत 46 है.क्या सजा और प्रदूषण के बीच सीधा संबंध है ? क्या तरह- तरह से वायु मंडल को प्रदूषित करने वालों को सजा का कोई भय नहीं होता.क्या वे यह समझते हैं कि पैसे या पैरवी के बल पर अंततः वे छूट ही जाएंगे ?
हालांकि, इस नकारात्मकता के बीच दो सकारात्मक बातें भी हाल में सामने आई हैं. इसी साल अगस्त में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि देश में सजा का प्रतिशत बढ़ाने के ठोस उपाय किए जायेंगे.
इधर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रदूषण की भीषण समस्या से निबटने के लिए कई महत्वपूर्ण उपायों की बुधवार को घोषणा की .
एक अनोखी पेंशन योजना
इस देश में एक ऐसी अनोखी पेंशन योजना सन 1995 में शुरू की गयी, जिसमें वृद्धि का कोई प्रावधान ही नहीं है.अन्य पेंशन योजनाओं में महंगी के अनुपात में बढ़ोतरी होती रहती है, पर जिसमें वृद्धि नहीं होती,वह है कर्मचारी भविष्य निधि योजना के तहत शुरू की गयी पेंशन योजना. इस योजना के तहत तीस साल काम कर चुके व्यक्ति को भी अधिकत्तम ढाई हजार रुपए मासिक ही मिल रहे हैं.
ऐसे पेंशन भोगियों के अखिल भारतीय संगठन ने इसे बढ़ा कर कम से कम 7500 रुपये मासिक कर देने की मांग की है. इस मांग को लेकर वे आंदोलन करने जा रहे हैं.
सेवानिवृत्त श्रमजीवी पत्रकारों को भी इसी योजना के तहत मासिक पेेंशन का भुगतान होता है. कुछ राज्य सरकारों ने रिटायर पत्रकारों के लिए पेंशन का प्रावधान किया है. यदि इपीएफ पेंशन योजना के तहत पेंशन की राशि सम्मानजनक कर दी जाये, तो राज्य सरकारों पर रिटायर पत्रकारों को पेंशन देने का दबाव कम हो जायेगा.
तब की स्थिति में सीमित साधनों वाली राज्य सरकारें उन पत्रकारों को भी पेंशन देने पर विचार सकती है, जो इपीएफ योजना के दायरे में नहीं आते. उससे मुफस्सिल पत्रकार लाभन्वित हो सकते हैं.
भूली-बिसरी याद
1988 में किरण बेदी उत्तरी दिल्ली पुलिस की उपायुक्त थीं. सेंट स्टीफंस काॅलेज में चोरी के एक मामले में एक वकील राजेश अग्निहोत्री को गिरफ्तार कर लिया गया था.16 फरवरी, 1988 को अग्निहोत्री को हथकड़ी पहना कर कचहरी में हाजिर किया गया. इसके विरोध में जब सैकड़ों वकीलों ने रोषपूर्ण प्रदर्शन किया तो पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज कर दिया.तनाव बढ़ा.
17 फरवरी को बेदी के समर्थन में नारे लगा रही भीड़ तीस हजारी अदालत में बेदी विरोधी वकीलों पर टूट पड़ीं. इस घटना पर तीखी प्रतिक्रियाएं हुर्इं और सुप्रीम कोर्ट के वकील भी बेदी के खिलाफ उठ खड़े हुए.बेदी के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर वकील अगले दिन हड़ताल पर चले गये. देश भर के वकीलों ने उनका साथ दिया.
वकीलों ने अपनी मांग पर जोर डालने के लिए सामूहिक अनशन भी किया. वकीलों ने ढाई महीनों तक हड़ताल रखी और अदालतों का कामकाज ठप कर दिया. अधिकतर उत्तरी राज्यों में भी यही हुआ. अंततः किरण बेदी का तबादला कर दिया गया, पर कुल मिलाकर बेदी ने पुलिस फोर्स का मनोबल बनाए रखा. इसीलिए आज भी दिल्ली के पुलिसकर्मियों के लिए किरण बेदी आदर्श र्है.
और अंत में
नोटबंदी के बावजूद भाजपा उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में जीत गयी. याद रहे कि उत्तरप्रदेश राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश है.
जीएसटी के बाद भी भाजपा गुजरात विधानसभा चुनाव जीत गयी. गुजरात में व्यवसाय बहुत होता है. आर्थिक मंदी के बावजूद भाजपा-शिवसेना मुंबई महानगर में स्थित 36 विधानसभा सीटों में से 30 सीटें जीत गयीं. मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है. अब सवाल उठता है कि ऐसे कौन से तत्व हैं, जो लोगों के लिए नोटबंदी, जीएसटी और आर्थिक मंदी की तकलीफों के बावजूद अधिक महत्वपूर्ण हैं ? प्रतिपक्ष जब तक उन तत्वों की पहचान कर उनका मुकाबला नहीं करेगा, तब तक उसका भविष्य अनिश्चित ही रहेगा.
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