सहकारी बैंक की नियमन प्रक्रिया में बदलाव की तैयारी
Updated at : 30 Oct 2019 8:10 AM (IST)
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सुबोध कुमार नंदन, पटना : पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक में करोड़ों रुपये के हुए घोटाले के बाद केंद्र सरकार सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलावों पर भी गंभीरता से विचार कर रही है. इसके तहत केंद्र सरकार सहकारी क्षेत्र की नियमन प्रक्रिया में बदलाव करेगी. अन्य बैंकों की तरह इसको भी भारतीय रिजर्व […]
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सुबोध कुमार नंदन, पटना : पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक में करोड़ों रुपये के हुए घोटाले के बाद केंद्र सरकार सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलावों पर भी गंभीरता से विचार कर रही है. इसके तहत केंद्र सरकार सहकारी क्षेत्र की नियमन प्रक्रिया में बदलाव करेगी.
अन्य बैंकों की तरह इसको भी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) जैसी किसी नियामक के दायरे में लाते हुए राजनीतिक दखल पर अंकुश लगाया जा सकता है. इस बीच वित्तमंत्री सीतारमण ने संकेत दिया है कि संसद के शीतकालीन सत्र में सहकारी बैंक के नियमों में बदलाव किया जा सकता है.
वित्त मंत्रालय के अधिकारी का कहना है कि केंद्र सरकार यह भी जानने की कोशिश कर रही है कि क्या इन बैंकों की उपयोगिता खत्म हो गयी है ? दरअसल, वाणिज्यिक बैंकों की पहुंच गांव-गांव तक होने और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग से क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के स्थापित होने से इसकी उपयोगिता पर सवालिया निशान लग रहा है.
इस बात का पता लगाया जा रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? उन्होंने संकेत दिया कि सरकार हर हाल में सहकारी बैंकों का प्रबंधन चुस्त-दुरुस्त चाहती है, ताकि जमाकर्ताओं का हित सुरक्षित रहे.
बैंक के जानकारों का कहना है कि सहकारी बैंक अब भी दोहरे नियमन से गुजर रहे हैं. हालांकि, बैंकिंग नियमन कानून 1949 में संशोधन कर वर्ष 1966 से ही सहकारी बैंकों को भी रिजर्व बैंक के दायरे में लाया जा चुका है, लेकिन अभी इस पर नियंत्रण सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार का ही है.
इन बैंकों की स्थापना ही सहकारी नियमों के तहत होती है और इस पर राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) का भी हस्तक्षेप होता है. लिहाजा इसे किसी एक नियामक के दायरे में लाने पर विचार चल रहा है. साथ ही इसका प्रबंधन राजनीतिक व्यक्ति से अलग कर किसी पेशेवर के हाथ सौंपा जा सकता है और इस बारे में विशेषज्ञों से भी सलाह ली जायेगी.
ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग सुविधा के जानकार और एआइबीओए के संयुक्त सचिव डीएन त्रिवेदी का कहना है कि सहकारी बैंकों में हद से ज्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप है. इनके अध्यक्ष का चुनाव वोट के जरिये होता है और यह संगठन पैसों के लेन-देन से जुड़ा है. अध्यक्ष बनने के लिए राजनीतिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति जोड़-तोड़ कर पद हासिल कर लेता है और बड़े लेनदेन में उसकी ही चलती है.
उन्होंने कहा कि कहने के लिए तो सहकारी बैंक के जमाकर्ताओं की एक लाख की जमा राशि डिपॉजिट एंड क्रेडिट गारंटी काॅरपोरशन के तहत बीमित है, लेकिन रिजर्व बैंक के प्रतिबंध के तहत जमाकर्ताओं को मात्र 10 हजार निकासी के लिए ही अधिकृत किया गया है. अगर समय रहते सहकारी बैंक के प्रबंधन और रिजर्व बैंक तथा नाबार्ड के निरीक्षण व अंकेक्षण प्रणाली में अपेक्षित सुधार नहीं किया गया तो अन्य सहकारी बैंकों के जमाकर्ताओं के साथ भी पीएमसी बैंक के ग्राहकों जैसा हाल हो सकता है.
नहीं मिला है पत्र
सहकारी क्षेत्र के नियमन प्रक्रिया में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार से इस संबंध में कोई पत्र नहीं प्राप्त हुआ है. अगर कुछ ऐसा होता है तो बिहार सरकार से मंतव्य लेना अनिवार्य होगा, क्योंकि सहकारी क्षेत्र बैंक का पूरा मामला राज्य सरकार से जुड़ा होता है.
संजय कुमार, जनसंपर्क अधिकारी, सहयोग समितियां (बिहार सरकार)
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