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पटना : कोर्ट और सरकार के रुख से साफ है कि नहीं बचेंगे अतिक्रमणकारी

Updated at : 18 Oct 2019 7:48 AM (IST)
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पटना : कोर्ट और सरकार के रुख से साफ है कि नहीं बचेंगे अतिक्रमणकारी

सुरेंद्र किशोर राजनीतिक विश्लेषक पटना में भारी जल जमाव के लिए जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ बिहार सरकार ने कार्रवाई शुरू कर दी है. अब पटना हाइकोर्ट ने कहा है कि आदेश के बावजूद जल-जमाव हमारे आदेश की अवमानना है. इसके लिए जो जिम्मेदार होंगे,वे बख्शे नहीं जायेंगे. लगा कि हाइकोर्ट राज्य सरकार की अफसरों के […]

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सुरेंद्र किशोर
राजनीतिक विश्लेषक
पटना में भारी जल जमाव के लिए जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ बिहार सरकार ने कार्रवाई शुरू कर दी है. अब पटना हाइकोर्ट ने कहा है कि आदेश के बावजूद जल-जमाव हमारे आदेश की अवमानना है.
इसके लिए जो जिम्मेदार होंगे,वे बख्शे नहीं जायेंगे. लगा कि हाइकोर्ट राज्य सरकार की अफसरों के खिलाफ ताजा कार्रवाइयों से संतुष्ट नहीं है. दरअसल हाइकोर्ट से आम लोग यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह जल जमाव के मूल कारणों की तलाश करने का प्रबंध करे. मोटा-मोटी इसका मूल कारण नगर निगम में व्याप्त अपार भ्रष्टाचार है जिसने संस्थागत रूप धारण कर लिया है. उसकी तह में सीबीआइ ही पहुंच सकती है. यह राज्य सरकार की किसी एजेंसी के वश की बात नहीं है.
राज्य सरकार की कार्रवाई भी अभूतपूर्व
पटना जलजमाव के लिए जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ इस बार जितने बड़े पैमाने पर कार्रवाई की घोषणा हुई है,वैसी कड़ी कार्रवाई होते अब तक नहीं देखा गया था. यदि घोषणाओं को तार्किक परिणति तक पहुंचा दिया जाये तो लापारवाह और भ्रष्ट कर्मियों को नसीहत मिलेगी.
उम्मीद है कि राज्य सरकार गैर जिम्मेवार अफसरों-कर्मियों के राजनीतिक-गैर राजनीतिक पैरवीकारों के दबाव में नहीं आयेगी. राज्य सरकार की यह घोषणा महत्वपूर्ण है कि नालों पर से अगले दो महीनों में अतिक्रमण हटवा दिए जायेंगे. पिछले कुछ हफ्तों में शासन ने जिस तरह पटना में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है,उससे उम्मीद बंधती है. पर नालों पर अतिक्रमणकारी कुछ अधिक ही प्रभावकारी व ढीठ हैं. उन पर यदि सचमुच कार्रवाई हो गयी तो शासन का इकबाल कायम हो जायेगा. वैसे पटना नगर निगम में संस्थागत हुए भ्रष्टाचार को राज्य सरकार किस तरह समाप्त करेगी,यह भी एक यक्ष प्रश्न है.
रिंग रोड से घटेगा पटना पर आबादी का बोझ
भारी वर्षा से जल जमाव,बाढ़,वायु प्रदूषण,रोड जाम और भू-जल की कमी आदि की समस्याओं से पटना को राहत दिलानी हो तो प्रस्तावित पटना रिंग रोड पर शीघ्र काम शुरू कर देना होगा. यह रिंग रोड प्रधान मंत्री पैकेज का हिस्सा है. आम तौर पर रिंग रोड के आसपास खुली हवा में मूल नगर की कुछ आबादी शिफ्ट करती है और नयी आबादी बसती है. इससे मूल नगर पर आबादी का दबाव कम होता है. आबादी कम यानी जन सुविधाओं पर दबाव कम.
सीपीआइ की सकारात्मक पहल
सीपीआइ की केरल शाखा ने एक अनोखी पहल की है. वह 25 अक्तूबर से तीन दिनों का सेमिनार आयोजित करने जा रही है. उस सेमिनार में हिंदू धर्म ग्रंथों पर चर्चा होगी. उसमें देश भर के वैज्ञानिक सोच वाले नौ विशेषज्ञ अपने पेपर पढ़ेंगे. वे पेपर वेद ,पुराण और उपनिषदों पर आधारित होंगे.
उन धर्म ग्रंथों पर वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में नजर डाली जायेगी. इस संबंध में एक सीपीआइ नेता ने बताया कि हम चाहते हैं कि सांप्रदायिक तत्व उन धर्म ग्रंथों का अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल न करें. काश ! सीपीआइ अन्य धर्मों के ग्रंथों पर भी इसी तरह वैज्ञानिक दृष्टि से नजर डालती !
हिन्दू धर्म ग्रंथों का कुछ लोग दुरुपयोग कर रहे हैं. यानी,सीपीआइ यह मानती है कि उन ग्रंथों का सदुपयोग भी हो सकता है. यानी सीपीआइ सत्तर के दशक से बहुत आगे चली आयी है. यह एक तरह से जड़ों से जुड़ने और समझने की जाने-अनजाने कोशिश है. कोशिश सराहनीय है.
इस पार्टी में सबसे बड़ी कमी यही रही है कि वह देश की जड़ों से कटी रही है। त्यागी-तपस्वी नेताओं व कार्यकर्ता से भरी पार्टी होने के बावजूद यह इस गरीब देश में भी पूरी तरह जम नहीं पायी. अब तो जो भी बचा है,उसके उखरते जाने के संकेत भी मिल रहे हैं. सत्तर के दशक में सीपीआइ के अध्यक्ष एस.ए.डांगे के दामाद वाणी देशपांडेय ने वेदों पर एक किताब लिखी थी. उन्होंने वेदों में मार्क्सवादी द्वंद्ववाद की झलक पायी थी. डांगे साहब ने उसकी प्रशंसात्मक भूमिका लिखी थी. उस पर पार्टी डांगे पर काफी नाराज हो गयी थी.
उम्मीदवारों के आपराधिक रेकाॅर्ड का विवरण
11 नवंबर, 2018 को चुनाव आयोग ने कहा था कि मतदान से पूर्व अपने आपराधिक रिकाॅर्ड के विज्ञापन अखबारों में और टी.वी.पर नहीं देने वाले उम्मीदवारों को अदालत की अवमानना का सामना करना पड़ सकता है.
विज्ञापन तीन बार देने होंगे. यह सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है. इन दिनों बिहार में भी कई क्षेत्रों में उप चुनाव हो रहे हैं. क्या आपने किसी उम्मीदवार के बारे में ऐसे विवरण किसी अखबार में विज्ञापन के रूप में देखा . क्या सुप्रीम कोर्ट ने अपनी गाइडलाइन वापस ले ली है. ऐसी कोई खबर भी नहीं देखी गयी.
और अंत में
देश की राजधानी में कुछ ही दिनों के भीतर प्रधान मंत्री के परिजन,मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट और पत्रकार से लुटेरों ने सामान छीने. तीनों मामलों में अपराधी पकड़ लिये गये. यह माना जाता है कि पुलिस जिन अपराधियों को पकड़ना चाहती है,उन्हें तो वह पकड़ ही लेती है. इन मामलों में भी यही हुआ. यह भी आम धारणा है कि अपवादों को छोेड़कर इस देश की पुलिस अपने इलाके के अपराधियों को जितना अधिक जानती-पहचानती है,उतना कुछ ही अन्य देशों की पुलिस अपने क्षेत्राधिकार के अपराधियों को जानती-पहचानती होगी ! इसके बावजूद इस देश में आरोपित अपराधियों में से सिर्फ 45 प्रतिशत अपराधियों को ही अभियोजन पक्ष कोर्ट से सजा दिलवा पाता है. ऐसा क्यों ? बात कुछ समझ में आई !!
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