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सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में पुराने सिलेबस की किताबें

Updated at : 13 Aug 2019 7:28 AM (IST)
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सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में पुराने सिलेबस की किताबें

पटना : पटना शहर ही नहीं समूचे प्रदेश के इंटर स्कूलों के पुस्तकालयों में हाइस्कूल की किताबें पुराने सिलेबस की हैं. शहर के कुछ स्कूलों की लाइब्रेरी में सर्वेक्षण करने के बाद इस बात का पता चला है. हालांकि, इंटर की अधिकतर पुस्तकें पुस्तकालयों में हैं. अधिकतर प्राइवेट प्रकाशन की किताबें हैं. जबकि, उन्हें 75 […]

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पटना : पटना शहर ही नहीं समूचे प्रदेश के इंटर स्कूलों के पुस्तकालयों में हाइस्कूल की किताबें पुराने सिलेबस की हैं. शहर के कुछ स्कूलों की लाइब्रेरी में सर्वेक्षण करने के बाद इस बात का पता चला है. हालांकि, इंटर की अधिकतर पुस्तकें पुस्तकालयों में हैं.

अधिकतर प्राइवेट प्रकाशन की किताबें हैं. जबकि, उन्हें 75 फीसदी से अधिक किताबें सरकारी प्रकाशनों की खरीदनी चाहिए थी. प्राइवेट प्रकाशनों की किताबों की खरीदी का रहस्य भी सहज समझा जा सकता है. फिलहाल कुछ एक पुस्तकालयों को अपवाद छोड़ दें, तो पुस्तकालयों में संदर्भ किताबों का जबरदस्त अभाव है.
कक्षा 9 व 10 की किताबें भी नहीं : मिलर स्कूल की लाइब्रेरी में विज्ञान व गणित विषय के संदर्भ ग्रंथों की बात छोड़ दें, तो कक्षा 9 व 10 की किताबें भी नहीं है. प्रिंसिपल डाॅ आजाद चंद्रशेखर प्रसाद चौरसिया ने साफ कर दिया कि हमारे यहां कक्षा 9वीं व 10वीं की पुराने सिलेबस की किताबें हैं.
नये सिलेबस की किताबें नहीं हैं. अधिकतर स्कूल की यही हालत है. दयानंद प्लस-टू हाइस्कूल की बात करें, तो वहां भी नये सिलेबस की किताबें नहीं थीं. केवल दो अलमारी में कुछ किताबें थीं. उनका कोर्स से कोई संबंध में नहीं था.
वे संदर्भ पुस्तकें भी नहीं थीं. अलबत्ता स्कूल के प्राचार्य सत्येंद्र नारायण सिंह ने दावा किया कि हमारी लाइब्रेरी शानदार है. गजब की बात यह है कि साल में दस हजार रुपये नियमित तौर पर हाइस्कूल व इंटर स्कूलों को अपने काम की किताबें खरीदने के लिए मिलता है.
कमोबेश यही हालात शहर के जाने-माने मॉडल स्कूल बांकीपुर गर्ल्स हाइस्कूल की है. यहां के बच्चों ने बताया कि लाइब्रेरी बहुत कम खुलती है. यहां लाइब्रेरी बंद मिली. केवल पटना हाइस्कूल पुराना होने की वजह से उसकी लाइब्रेरी ठीक-ठाक मिली.
चार लाख की किताबों का कोई अता-पता नहीं : करीब दस साल पहले प्रदेश भर में इंटरमीडिएट की पढ़ाई कराने वाले स्कूलों को चार-चार लाख रुपये किताबें खरीदने को दिये गये थे.
चार लाख रुपये की किताबें खरीदी भी गयी की नहीं, इसका हिसाब किसी के पास नहीं है. सूत्रों के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र के किसी भी इंटर स्कूल में किताबों की खरीदी नहीं की गयीं. कई बार किये गये निरीक्षण में किताबें नहीं मिली.
विशेष फैक्ट
इस सत्र को छोड़कर पिछले दस सालों तक प्रत्येक इंटर स्कूल को राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान योजना के तहत दस हजार रुपये सालाना किताबों के लिए दिये जाते थे. उस पैसे का कहां उपयोग हुआ? इसका कोई ऑडिट नहीं किया गया.
हम इंटर स्कूलों की लाइब्रेरियों को चेक करायेंगे. बच्चों के लिए किताबें तो उन्हें खरीदनी ही होगी. इस मामले में उचित कार्रवाई की जायेगी.
ज्योति कुमार, जिला शिक्षा पदाधिकारी, पटना
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