पटना : इलाज हो रहा, पर दवा लेना है कठिन
Updated at : 04 Apr 2019 9:19 AM (IST)
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आनंद तिवारी आइजीआइएमएस. छह हजार मरीजों के लिए महज एक दवा दुकान अमृत दवा दुकान महज दिखावा पटना : आइजीआइएमएस में इन दिनों मरीजों को इलाज से अधिक परेशानी दवा लेने में हो रही है. इसकी मुख्य वजह है कि अस्पताल के लगभग छह हजार मरीजों के लिए मात्र एक दवा दुकान का होना है. […]
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आनंद तिवारी
आइजीआइएमएस. छह हजार मरीजों के लिए महज एक दवा दुकान
अमृत दवा दुकान महज दिखावा
पटना : आइजीआइएमएस में इन दिनों मरीजों को इलाज से अधिक परेशानी दवा लेने में हो रही है. इसकी मुख्य वजह है कि अस्पताल के लगभग छह हजार मरीजों के लिए मात्र एक दवा दुकान का होना है. परिसर में कैंटीन के ठीक बगल में संचालित एकमात्र प्राइवेट दवा दुकान में भीड़ इतनी अधिक होती है कि घंटों लाइन लगने के बाद मरीज का नंबर आता है.
आइजीआइएमएस परिसर में ही 20 से 60 प्रतिशत सस्ते दाम पर दवा बेचने के लिए अमृत दवा दुकान भी खोली गयी है. लेकिन, यहां दवाएं नहीं होने से परिसर में संचालित एकमात्र प्राइवेट दवा दुकान ही मरीजों का सहारा होता है. आइजीआइएमएस में रोजाना तीन से चार हजार नये मरीज ओपीडी व इमरजेंसी में इलाज कराने आते हैं. इसके अलावा दो हजार मरीज पहले से भर्ती रहते हैं.
इनको रोजाना डॉक्टर दवाएं लिखते हैं. ये मरीज पहले अमृत दवा दुकान, फिर कैंटीन के बगल वाली प्राइवेट दवा दुकान पर जाते हैं. समय पर दवा नहीं मिलने पर उनको बैंडेज-रूई जैसी छोटी चीजों के लिए भी बेली रोड की दौड़ लगानी पड़ती है.
क्या कहते हैं अफसर
अमृत दवा दुकान में क्यों
दवाएं नहीं मिल रहीं, इसकी जानकारी ली जायेगी. वहां सस्ती दरों पर मरीजों को दवाएं देनी है. परिसर में मात्र एक दवा दुकान की वजह से मरीजों को हो रही परेशानी को लेकर संबंधित अधिकारी से बात करूंगा. परिसर में दवा दुकान की संख्या क्यों नहीं बढ़ रही इसको देखता हूं.
संजय कुमार, प्रधान सचिव, स्वास्थ्य विभाग
क्या कहते हैं मरीज व उनके परिजन
पेट व शौच की परेशानी के बाद आइजीआइएमएस आया. जहां 430 नंबर रूम के आइसीयू में भर्ती किया गया है. यहां रोजाना डॉक्टर दवा लिखते हैं. पत्नी व भाई दवा लेने जाते हैं. लेकिन, वह घंटों बाद दवा लेकर आते हैं. पत्नी बताती है दवा दुकान में काफी भीड़ होती है.
बीरबल, मरीज
मेरी मां इमरजेंसी में भर्ती हैं. मां कीदवा खत्म होने के दो दिन पहले ही मैं
कैंटीन के बगल वाली दुकान पर दवा लेने पहुंच जाता हूं. यहां प्रिंट रेट से ब्रांडेड दवाएं मिलती हैं. साथ ही दवा लेने के लिए लंबी लाइन और भीड़ का सामना करना पड़ता है.
ललित कुमार झा, मरीज का बेटा
– कैंटीन के पास वाली दवा दुकान के कर्मियों का व्यवहार ठीक नहीं लगता. अगर जल्दी दवा की मांग करते हैं, तो तुरंत वह आक्रोशित होने लगते हैं. जबकि, दवा दुकान के ठीक सामने दो सुरक्षा कर्मी भी बैठे रहते हैं. वह सब नजारा देखते हैं. लेकिन, मरीजों की पीड़ा को कोई नहीं देखता.
नागेंद्र कुमार, मरीज का बेटा
मेरी पत्नी न्यूरो सर्जरी विभाग में भर्ती है. मैं दो बार अमृत दवा दुकान में दवा लेने गया. लेकिन, एक भी दवा नहीं मिली. मजबूरन कैंटीन की बगल वाली दवा दुकान के पास गया, वहां 40 मिनट के बाद मुझे किसी तरह दवाएं दी गयी. अस्पताल प्रशासन को पांच से सात दवा दुकानें और खोलने की जरूरत है.
अजय कुमार, मरीज का पति
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