जदयू विधायक और भागलपुर कृषि विवि के पूर्व वीसी को इस मामले में पटना हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 22 Aug 2017 2:24 PM
पटना :बिहारमें मुुंगेर के तारापुर से जदयू विधायक एवं बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के तत्कालीन वीसी मेवालाल चौधरी को पटना हाईकोर्ट ने एक बड़ी राहत प्रदान करते हुए अग्रिम जमानत दे दी है. न्यायाधीश राजेंद्र कुमार मिश्रा की एकलपीठ ने विधायक मेवालाल चौधरी की ओर से दायर अग्रिम जमानत याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते […]
पटना :बिहारमें मुुंगेर के तारापुर से जदयू विधायक एवं बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के तत्कालीन वीसी मेवालाल चौधरी को पटना हाईकोर्ट ने एक बड़ी राहत प्रदान करते हुए अग्रिम जमानत दे दी है. न्यायाधीश राजेंद्र कुमार मिश्रा की एकलपीठ ने विधायक मेवालाल चौधरी की ओर से दायर अग्रिम जमानत याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए उक्त निर्देश दिया.
गौरतलब है कि वर्त्तमान में तारापुर से जदयू के विधायक मेवालाल चौधरी पर बिहार के तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद के आदेश पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर के वीसी डॉ अजय कुमार सिंह ने सबौर थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाई थी. मेवालाल चौधरी के ऊपर सबौर थाना में कांड संख्या 35/2017 भादवि की धारा 409, 420, 467, 468, 471, 120 बी के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया था.
मेवालाल पर आरोप
दर्ज प्राथमिकी में मेवालाल चैधरी के ऊपर साल 2012 में 161 सहायक प्राध्यापक और कनीय वैज्ञानिकों की भर्ती में धांधली का आरोप लगाया गया था. साथ ही साथ उनपर आरोप लगाया गया कि योग्य अभ्यर्थियों को साक्षात्कार और प्रोजेक्ट में कम अंक देकर उन्हें अयोग्य करार दिया. आरोप यह भी लगा कि इस नियुक्ति में 15 से 20 लाख रुपये की बोली लगाई गयी थी. जिसके कारण कम योग्यता वाले अभियार्थियों नियुक्त किया गया. इस प्राथमिकी के दर्ज होते ही उनपर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है.
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया था कि वर्तमान जदयू विधायक और पूर्व वीसी डॉ मेवालाल चौधरी को इस मामले में फंसाया जा रहा है क्योंकि यह नियुक्ति 20 साक्षात्कार कमेटियों के जरिये 161 अभ्यर्थियों को चयनित किया गया था जिनमें विश्वविद्यालय के 30 से ज्यादा वरीय अधिकारी इसमें शामिल थे. इस नियुक्ति में याचिकाकर्ता की कोई भूमिका नहीं है वो सिर्फ इस कमिटी के अध्यक्ष थे जबकि इसमें पुरी तरह से एक एक्सपर्ट की कमिटी थी. इस त्रिस्तरीय कमिटी की अलग-थलग भूमिका थी.
वहीं मामले में शिकायत करता द्वारा अदालत को बताया गया कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान मूल्यांकन और अंक प्रदान करने में भारी अनियमितता बरती गयी है. साथ ही अदालत को यह भी बताया गया कि उक्त नियुक्ति में पैसों की भी लेन-देन हुई है.
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