हेरा गेलो जिंदगी के बड़का चिजोर इहे से अखियां से ढ़रक हे लोर..

Updated at : 21 Jun 2015 11:16 AM (IST)
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हेरा गेलो जिंदगी के बड़का चिजोर  इहे से अखियां से ढ़रक हे लोर..

फादर्स डे पर आयोजित काव्य गोष्ठी में कवियों ने शमां बांधा बिहारशरीफ : फादर्स डे के अवसर पर प्रभात खबर के सौजन्य से शनिवार को कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया. कवि गोष्ठी में शहर के नामचीन कवि एवं साहित्यकारों ने पिता- पुत्र के संबंधों पर गीत व सधे हुए शब्दों के माध्यम से समाज […]

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फादर्स डे पर आयोजित काव्य गोष्ठी में कवियों ने शमां बांधा
बिहारशरीफ : फादर्स डे के अवसर पर प्रभात खबर के सौजन्य से शनिवार को कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया. कवि गोष्ठी में शहर के नामचीन कवि एवं साहित्यकारों ने पिता- पुत्र के संबंधों पर गीत व सधे हुए शब्दों के माध्यम से समाज को सारगर्भित एवं प्रेरक संदेश देने का काम किया.
संगोष्ठी के दौरान ज्यादातर कवि व साहित्यकारों ने समाज में बुजुर्गो की स्थिति, पिता – पुत्र के बीच उत्पन्न खाई एवं इस स्थिति के लिए जिम्मेवार कारणों को काफी प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया. उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति में गिरावट, भोगवादी एवं भौतिकवादी अप संस्कृति को बढ़ावा दिये जाने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है. बुजुर्ग यानी यूं कहें कि पिता को हाशिये पर डाल दिया गया है. उनका मान- सम्मान व सेवा न कर उनके अपने ही बच्चे उपेक्षा करने पर उतारू है.
बच्चों के पालन- पोषण एवं तरक्की के लिए जिंदगी भर कड़ी मेहनत करनेवाले पिता के दर्द का अहसास पुत्र को तभी होता है, जब वह स्वयं पिता बनता है. कई साहित्यकारों ने अपना विचार प्रकट करते हुए कहा कि इस खाई बनने के पीछे पिता भी कहीं-न-कहीं जिम्मेवार हैं. पैसे कमाने की धुन में वे अपने बच्चों को न तो सही मार्गदर्शन दिखाते हैं और न ही उन्हें पर्याप्त समय. परिणामस्वरूप बच्चे गलत रास्ते पकड़ लेते हैं तथा सेवा संस्कार जैसे गुणों से अनभिज्ञ रह जाते हैं.
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए रिटायर्ड एडीएम सह मगही कवि मुनेश्वर शमन ने कहा कि बच्चों को यह अहसास दिलाने की जरूरत है कि उनके मां-बाप ने कितने त्याग व परिश्रम से उन्हें समाज में खड़ा होने के लायक बनाया है.
उन्होंने बुजुर्गो की स्थिति एवं उनकी भावना को अपने गीत के माध्यम से चित्रित किया. ‘ ई नय भूले नइकी पीढ़ी कि ओकरे दिन अइते, कसगर-रसगर बांके बिहारी उमरिया जब बिला जइते..’. इसी प्रकार कवि सुभाष चंद्र पासवान ने अपने मगही गीत ‘ आश कर – कर के विश्वास टूटल हमर अपना हित ला हितैषी भी उठल हमर, बुढ़ दादा – बूढ़ बैला और खिलौना है पुरान, रखे ला मजबूर है, तो इनका ला हइ अलग बथान..’ के माध्यम से पिता का वर्तमान संदर्भ में सामाजिक स्थिति का वर्णन किया.
कवि उमेश प्रसाद ने कहा कि हर पिता का अपने पुत्र के प्रति वहीं प्रेम होता है जो दशरथ का राम के प्रति था. अगर पुत्र दूर रहकर भी उनके प्रति सहानुभूति दिखाएं तो उपेक्षा के दर्द से पिता को मुक्ति मिल सकती है. उन्होंने भी अपने मगही गीतों से सामाजिक ताने- बाने को काफी बेलाग प्रस्तुति की. संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बेनाम गिलानी ने कहा कि संस्कृति व इतिहास से प्रेरित होकर हमें प्रेम व सेवा भाव को अपनाने की जरूरत है, तभी पिता-पुत्र के बीच उत्पन्न खाई को भरा जा सकता है.
उन्होंने काव्य पाठ के दौरान, ‘बस हुआ इतना सजा उन्होंने दिया, मुझको होनी ने कुछ होने न दिया, जागृति लानी थी जिन्हे, घोर निद्रा में उन्हें सोने दिया.. ’ की प्रस्तुति कर लोगों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया.
कवि अजरुन प्रसाद बादल ने अपनी भावना को इस कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया, ‘एक ही छत में रहकर भी होती मुलाकात नहीं, अब पहले वाली बात नहीं ….’. काव्य की इस महफिल को आगे बढ़ाते हुए कवि रणजीत दुधू ने अपनी कविता ‘ हेरा गेलो जिंदगी के बड़का चिजोर, इहे से अखियां से ढ़रक हे लोर.. को काफी मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया. काव्य गोष्ठी का समापन महेंद्र कुमार विकल ने पिता – पुत्र के संबंध का काफी सारगर्भित संदेश देने के साथ किया.
उन्होंने ‘ यह सही है कि आज आप नहीं हैं, पर आपके होने का अहसास आज भी बाकी है और रहेगा मरते दम तक.. कविता के माध्यम से यह संदेश दिया कि पिता के द्वारा दिये गये विरासत को बनाये रखना एवं उसे आगे बढ़ाना पुत्र का नैतिक दायित्व है.
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