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किसको फुर्सत, कौन सुनेगा, फिर भी लिखना-गाना है...

Updated at : 21 Oct 2024 1:40 AM (IST)
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किसको फुर्सत, कौन सुनेगा, फिर भी लिखना-गाना है...

किसको फुर्सत, कौन सुनेगा, फिर भी लिखना-गाना है...

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मुजफ्फरपुर.

रामदयालु सिंह महाविद्यालय, मानविकी संकाय, बी.आर.अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय एवं अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर के संयुक्त तत्वावधान में रामदयालु सिंह महाविद्यालय के सभागार में द्वि- दिवसीय संगोष्ठी के दूसरे दिन संध्या में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. रवींद्र उपाध्याय ने अपनी रचना “किसको फुर्सत, कौन सुनेगा, फिर भी लिखना-गाना है…फैल गया बाजार हर तरफ, अद्भुत है गहमागहमी. धन का उद्धत नृत्य चल रहा, इतराती है बेशर्मी. विज्ञापन का महाजाल है, तिकड़म का ताना-बाना है ” सुनाकर वर्तमान समय की सच्चायी को बयां किया. मुंबई से पहुंचे पत्रकार व फिल्मकार अविनाश दास ने सुनाया कि “एक दूनी दो, दो दूनी चार, आंगन में पसरा है आम का आचार. दुख हो तो दुख को आहिस्ते से सहना, कहना जरूरी हो तो ही कुछ कहना, ढहने से ही आती है जीवन में धार, एक दूनी दो, दो दूनी चार… के माध्यम से लोगों को सोचने पर विवश कर दिया.

कवि रमेश ऋतंभर ने मेरे होने में दूसरों के प्यार, पानी और प्रार्थना का हाथ है, मेरा कुछ नहीं… सुनायीं. प्रो रवीन्द्र उपाध्याय की अध्यक्षता व चन्द्रदेव सिंह के संचालन में कवियों ने काव्य-पाठ किया. कविता पाठ करने वालों में डॉ संजय पंकज, डॉ पूनम सिंह, पंखुड़ी सिन्हा, अनीता सिंह, सरोज वर्मा, ललन लालित्य, अनिल गुप्ता, उदय सिंह उदय समेत अन्य कवि शामिल हैं.

अब कर्त्तव्य से ही होगी पत्रकारिता की रक्षा : अविनाश

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में प्रखर आलोचक प्रो मदन कश्यप की अध्यक्षता में ””””वर्तमान समय में पत्रकारिता की चुनौतियां”””” विषय पर विचार-विमर्श हुआ. अपने उद्घाटन-भाषण में प्रख्यात पत्रकार एवं फिल्म निर्माता अविनाश दास ने कहा कि पत्रकारिता की रक्षा अब कर्त्तव्य से ही होगी.अब कला का कोई काम नहीं रहा. चाहे कैसी भी विपरीत परिस्थिति हो प्रतिपक्ष के लिए जगह बन ही जाती है. मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो.सतीश राय ने कहा कि पत्रकारिता की शुरुआत ही प्रतिरोध से हुई है. आजकल के पूर्व संपादक राकेश रेणु ने कहा कि 2019 के पहले तक सोशल मीडिया भ्रामक प्रचार का माध्यम बन गयी थी. एलएनएमयू के प्रो चंद्रभानु प्रसाद सिंह ने कहा कि डिजिटल मीडिया आज भी मध्य वर्ग तक ही सीमित है. गांवों में आज भी अखबार का क्रेज है.

बनारस हिन्दू विवि के प्रो नीरज खरे ने कहा कि आजादी के बाद पत्रकारिता के स्तर में गिरावट आयी है. कवि संजय पंकज ने अखबारों के माध्यम से खलनायक को नायक बना देने की परिपाटी की निंदा की. अपने अध्यक्षीय भाषण में मदन कश्यप ने कहा कि पत्रकारिता की भाषा में कल्पना-शक्ति का ह्रास हुआ है. इस सत्र का संचालन अनिल गुप्ता और धन्यवाद-ज्ञापन डॉ नीरज कुमार मिश्र ने किया. गांधी व आंबेडकर को अस्मिता विमर्श के सूत्रधार के रूप में देखना चाहिए :””””हाशिए का समाज व अस्मिता विमर्श”””” विषयक दूसरे सत्र में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रख्यात चिंतक-आलोचक डॉ रविभूषण ने कहा कि यह विचारणीय है कि पित्तृसत्ता, धर्मसत्ता, अर्थसत्ता, राज्यसत्ता व संघसत्ता का आपस में क्या सम्बन्ध है? आज जरूरी है सभी अस्मिताओं को अकेले की बजाय मिलकर साझा संघर्ष करना होगा. बीआरएबीयू के प्रो प्रमोद कुमार ने कहा कि गांधी व आंबेडकर को अस्मिता विमर्श के सूत्रधार के रूप में देखना चाहिए. केन्द्रीय विवि मोतिहारी के प्रो राजेन्द्र बड़गूजर, दिल्ली विवि की प्राध्यापक डॉ रश्मि रावत ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया. दूसरे सत्र का संचालन जयप्रकाश व धन्यवाद ज्ञापन डॉ नूतन ने किया.

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