नाम में निहित है परम शक्ति : पुरोधा प्रमुख

Updated at : 13 Mar 2026 8:12 PM (IST)
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नाम में निहित है परम शक्ति : पुरोधा प्रमुख

आनंद संभूति मास्टर यूनिट अमझर के मैदान में शुक्रवार को आनंद मार्ग प्रचारक संघ का तीन दिवसीय विश्व स्तरीय धर्म महासम्मेलन आरंभ हो गया.

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आनंद संभूति मास्टर यूनिट अमझर में आनंद मार्ग का तीन दिवसीय विश्व स्तरीय धर्म महासम्मेलन आरंभजमालपुर. आनंद संभूति मास्टर यूनिट अमझर के मैदान में शुक्रवार को आनंद मार्ग प्रचारक संघ का तीन दिवसीय विश्व स्तरीय धर्म महासम्मेलन आरंभ हो गया. कार्यक्रम का शुभारंभ पांचजन्य गुरु सकाश आसन के साथ आरंभ हुआ.

पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्व देवानंद अवधूत के आगमन पर सिक्योरिटी इंचार्ज पारस के नेतृत्व में स्वयंसेवकों द्वारा उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया. इसके बाद हरि परिमंडल गोष्ठी की आचार्या अवधुतिका आनंद आराधना के नेतृत्व में 22 साधिकाओं द्वारा कौशिकी और आचार्य सुष्मितानंद अवधूत के निर्देशन में 16 बाल साधुओं द्वारा तांडव नृत्य प्रस्तुत किया. इसके बाद आचार्य जगन आत्मानंद अवधूत ने प्रभात संगीत की प्रस्तुति दी. जिसका हिंदी अनुवाद प्रद्युम्न नारायण, अंग्रेजी अनुवाद आचार्य राज मायानंद अवधूत ने और बांग्ला अनुवाद अवधुतिका आचार्य आनंद प्रतिष्ठा ने किया.

नाम कीर्तन की महिमा पर ओजपूर्ण प्रवचन

पुरोधा प्रमुख ने नाम कीर्तन की महिमा विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति या वस्तु को संबोधित करने के लिए नाम आवश्यक होता है, किंतु नाम केवल एक शब्द नहीं है. एक प्राचीन प्रश्न यह भी है कि अधिक शक्तिशाली कौन है. परम पुरुष या उनका नाम. इस संदर्भ में उन्होंने हनुमान और भगवान श्री राम का उदाहरण देते हुए कहा कि हनुमान ने समुद्र पार करने से पहले श्रीराम का नाम लेकर ही अपनी शक्ति प्राप्त की. इससे स्पष्ट होता है कि नाम में निहित शक्ति अत्यंत प्रभावशाली होती है. उन्होंने कहा कि जबतक भक्त नहीं थे, तबतक भगवान का कोई नाम भी नहीं था. भक्तों ने ही भगवान को नाम दिया. इसी कारण भगवान और भक्तों के बीच एक मधुर संबंध और प्रेम पूर्ण संवाद है.

भगवान भक्तों को श्रेष्ठ मानते हैं और भक्त भगवान को

नाम की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि नाम में निहित शक्ति केंद्रित और सुप्त अवस्था में रहती है. जब नाम का उच्चारण होता है, तब वह शक्ति सक्रिय होकर प्रभाव उत्पन्न करती है. ओम का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसमें स्थित बिंदु संभावित शक्ति का प्रतीक है और अर्धचंद्र उसे शक्ति की अभिव्यक्ति का प्रतीक है. उन्होंने हनुमान का उदाहरण देते हुए कहा कि यद्यपि परम पुरुष के अनेक नाम है, फिर भी हनुमान के लिए सब कुछ केवल श्रीराम ही है. निरंतर नाम जप करते-करते एक अवस्था ऐसी आती है. जब नाम नाम देने वाला और नाम लेने वाला तीनों लीन हो जाते हैं. यही समाधि की अवस्था है. आचार्य ने कहा कि परम पुरुष की महिमा का पूर्ण वर्णन भाषा में संभव नहीं है. उन्होंने एक श्लोक का अर्थ बताते हुए कहा कि यदि हिमालय स्याही बन जाए, समुद्र दवात हो, पारिजात वृक्ष की शाखा कलम हो और पृथ्वी कागज बन जाए तथा देवी सरस्वती अनंत काल तक लिखती रहे, तब भी परम पुरुष के गुणगान पूर्ण वर्णन संभव नहीं है. वास्तव में मनुष्य और परम पुरुष का संबंध प्रेम का संबंध है. साधना सेवा और पूजा इन सभी का अंतिम उद्देश्य परम पुरुष को संतुष्ट करना है, इसलिए साधक को सदैव स्मरण रखना चाहिए कि साधना और सेवा का लक्ष्य परम पुरुष की प्रसन्नता ही है. इस दौरान मंच पर आनंद मार्ग प्रचारक संघ के जनरल सेक्रेटरी आचार्य प्रणवेशानंद अवधूत, डीपीएस आचार्य मेघ दीपानंद अवधूत और पुरोधा प्रमुख के निज सहायक आचार्य अमलेश्वर आनंद अवधूत मौजूद थे.

धर्म सम्मेलन में शामिल हो रहे देश-विदेश के मार्गी

बताया गया कि इस विश्व स्तरीय धर्म महासम्मेलन में न केवल देश के विभिन्न प्रांतों के मार्गी और गृहस्थ, विदेशी आगंतुक भी शामिल हो रहे हैं. इस सिलसिले में आनंद मार्ग के संन्यासी रूस, ताइवान, इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया, न्यूयॉर्क, चाइना, साउथ अफ्रीका और नैरोबी से पहुंचे हुए हैं. इसके अतिरिक्त हजारों की संख्या में देश के विभिन्न कोने से गृहस्थ अपने परिवार के साथ भी शामिल हो रहे हैं.

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RANA GAURI SHAN

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