आधुनिकता के चकाचौंध में विलुप्त हो गयी फगुआ गीत

Published by : BIRENDRA KUMAR SING Updated At : 01 Mar 2026 10:40 PM

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आधुनिकता की चकाचौंध और बदलते परिवेश के साथ परंपरागत होली का फगुआ गीतों व ढोलक की थाप लगभग विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है

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पारंपरिक ढोल-मंजीरा की जगह, प्रतिबंधित डीजे ने ली जगहअब सुनायी नहीं देते पारंपरिक चैतावर व होली गीत

मुंगेर.

आधुनिकता की चकाचौंध और बदलते परिवेश के साथ परंपरागत होली का फगुआ गीतों व ढोलक की थाप लगभग विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है. कुछ साल पहले तक होली शुरू होते ही कस्बा और गांवों के गलियां, चौराहे फगुवा गीत से गुलजार हो जाते थे. ढोलक की थाप पर मजीरा, झांझ के साथ कर्णप्रिय गीत होली के एक सप्ताह पहले होली आने की जानकारी देने लगते थे, लेकिन आज इसकी जगह प्रतिबंधित डीजे ने ले ली है. जगह-जगह टिकट पर डीजे की कर्कश धुन पर टिकट कटा कर युवा पीढी डोल रहे है, मौज-मस्ती कर रहे हैं.

पहले के समय में जहां बसंत पंचमी से ही गांव में समूह बनाकर लोग पारंपरिक होली गीत को गाकर होली गायन की शुरुआत कर देते थे. होली के दिन देर रात तक कार्यक्रम चलता रहता था. समूह में लोग ढोलक की थाप पर फाग गीत गाकर मन मस्त होकर झूम उठते थे. अब यह परम्परा धीरे-धीरे सिमटने सी लगी है. इसका दायरा काफी संक्षिप्त हो चुका है. अब धूम धड़ाके, शोर शराबे तेज धमक वाले डीजे को लोग ज्यादा पसंद करने लगे हैं. होली के दिन दोपहर बाद अबीर गुलाल के बाद लोग समूहों में मनोरा, झूमर, फाग, रसिया,चहका आदि गंवई गीतों के साथ सबके दरवाजे पर पहुंच प्रेम और सौहार्द, भाईचारे का संदेश पहुंचाने वाली टोलिया अब कुछ ही गांवों में रह गई है.

डांस स्टूडियो, डांस ग्रुप को भाड़े पर बुलाया जा रहा

फाग गीतों की मधुर धुनों की जगह आज डीजे के शोर ने ले ली है. होली के पारंपरिक रीति-रिवाजों की जगह आधुनिक तौर-तरीकों ने ले ली है. मुंगेर में होली 4 मार्च को मनाया जायेगा. लेकिन इससे पहले शहर में रंगोत्सव होली कार्यक्रम डीजे जॉकी, डांस स्टूडियो, डांस ग्रुप को भाड़े पर बुलाया जा रहा है. कार्यक्रम से पहले शहर में इस कार्यक्रम को लेकर टिकट बेचा जाता है. जिन्होंने टिकट खरीदा, वहीं इस कार्यक्रम में भाग लेते है. प्रतिबंध के बावजूद डीजे सेट पर कर्कश आवाज में फुहड़ और रिमिक्स बजाये जाते है.

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