कांवरियों को 80 किमी का लफड़ा घोरघट बेली ब्रिज

Published at :06 Jul 2017 5:33 AM (IST)
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कांवरियों को 80 किमी का लफड़ा घोरघट बेली ब्रिज

बस सहित बड़े वाहनों के परिचालन पर है रोक, 80 किमी अतिरिक्त तय करनी पड़ती है दूरी मुंगेर : विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला नौ जुलाई से प्रारंभ हो रहा है. इसे लेकर एक बार फिर घोरघट बेली ब्रिज का महत्व काफी बढ़ गया है. पिछले 12 वर्षों से क्षतिग्रस्त घोरघट बेली ब्रिज कांवरियों के लिए […]

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बस सहित बड़े वाहनों के परिचालन पर है रोक, 80 किमी अतिरिक्त तय करनी पड़ती है दूरी

मुंगेर : विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला नौ जुलाई से प्रारंभ हो रहा है. इसे लेकर एक बार फिर घोरघट बेली ब्रिज का महत्व काफी बढ़ गया है. पिछले 12 वर्षों से क्षतिग्रस्त घोरघट बेली ब्रिज कांवरियों के लिए नासूर बना हुआ है. क्योंकि इस पुल से बस व अन्य बड़े वाहनों का परिचालन नहीं हो पा रहा. बड़े वाहनों को लखीसराय व जमुई के रास्ते घूम कर सुलतानगंज जाना पड़ता है. दूसरी ओर इसी क्षतिग्रस्त पुल से कांवरियों के छोटे वाहन गुजरेंगे, जो हादसों के शिकार बन सकते हैं.
12 वर्षों से बंद है बड़े वाहनों का परिचालन
पूर्व में बड़े-बड़े लग्जरी कोच, ट्रकों पर टेंट लगा कर कांवरिया इसी होकर सुलतानगंज जाते थे. सावन मास आते ही राष्ट्रीय उच्च पथ पर अनेकता में एकता की झलक देखने को मिलती थी. मानो पूरा भारत एक हो. हर भाषा के लोग सावन मास में मुंगेर में मिल जाते थे, लेकिन 2006 में जब यह घोरघट पुल क्षतिग्रस्त हुआ और लोहों के गाडर पर बेली ब्रिज बना दिया गया तो बड़े वाहनों के परिचालन पर रोक लगा दी गयी. श्रावणी मेला को देखते हुए बड़े वाहनों का मार्ग ही बदल दिया गया. लखीसराय के विद्यापति चौक से बड़े वाहनों को जमुई के लिए मोड़ दिया जाता है, जो लखीसराय, जमुई, मल्लेपुर, गंगटा जंगल, संग्रामपुर, तारापुर होते हुए सुलतानगंज पहुंचता है. अगर कुछ बड़े वाहन मुंगेर सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, तो उसे नयारामनगर थाना के नौवागढ़ी मसजिद मोड़ से ऋषिकुंड होकर असरगंज के रास्ते सुलतानगंज पहुंचाया जाता है.
सुरक्षा के दृष्टिकोण से घातक है रास्ता
बड़े वाहनों को एक ओर जहां गंगटा जंगल से गुजरना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर ऋषिकुंड होकर वाहन गुजरते हैं. गंगटा जंगल और ऋषिकुंड दोनों नक्सल प्रभावित हैं और सुरक्षा के दृष्टिकोण से खतरनाक है. गंगटा-जमुई मार्ग सड़क लूट का केंद्र बन गया है और गत वर्ष भी कांवरिया वाहनों को अपराधियों ने अपना शिकार बनाया था. इसी जंगल में सीआरपीएफ के दो जवानों को नक्सलियों ने गोलियों से छलनी कर दिया था. इतना ही नहीं ऋषिकुंड में नक्सलियों ने चार जवानों को मौत के घाट उतार कर हथियार छीन लिया था. आज 12 वर्षो से बड़े कांवरिया वाहन इन्हीं दोनों मार्ग से होकर गुजरते हैं, जहां से शाम होते ही सुरक्षा में तैनात बल हटा लिया जाता है.
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