मधुबनी: फूल लोढ़ने निकलीं नवविवाहिताएं, मधुश्रावणी को लेकर मिथिला का घर-आंगन भक्तिमय

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डाली में पूजन के लिए फूल सजाती नवविवाहिता | Prabhat Khabar Network

मिथिलांचल में मधुश्रावणी पर्व का उल्लास छाया है, जहाँ नवविवाहिताएं अपने सखियों के साथ पारंपरिक लोकगीतों के बीच फूल तोड़ रही हैं. यह 13 दिवसीय पर्व पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए किया जाता है.

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मधुबनी न्यूज: मधुश्रावणी पूजा को लेकर मिथिला का घर-आंगन इन दिनों भक्ति और उल्लास से सराबोर है. नवविवाहिताएं अहले सुबह सखियों के साथ फूल लोढ़ने निकल रही हैं. फूल चुनते समय गूंजते पारंपरिक लोकगीत और सखियों की हंसी-ठिठोली माहौल को खास बना रही है. 13 दिवसीय इस पर्व में नवविवाहिताएं पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य और अखंड सौभाग्य की कामना से विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर रही हैं.

फूल लोढ़ने में दिख रहा उत्साह

मंगलवार देर शाम नवविवाहिताओं की टोलियां गांव के चौक-चौराहों, मंदिरों, धार्मिक स्थलों और फूलवारियों में पहुंचीं. यहां से उन्होंने पूजा के लिए तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल एकत्र किए. फूल लोढ़ने के दौरान सखियों के साथ लोकगीत गाती नवविवाहिताओं का उत्साह देखते ही बन रहा था. इसके बाद घर लौटकर उन्होंने पूजा-अर्चना की.

मधुश्रावणी शुरू होने के साथ ही पूरे मिथिला क्षेत्र में उत्सव का माहौल बन गया है. अधिकांश नवविवाहिताएं मायके में रहकर इस पर्व की पूजा कर रही हैं. घर-आंगन में पारंपरिक गीतों की स्वर-लहरियां सुनाई दे रही हैं.

13 दिनों तक होती है विशेष पूजा

धार्मिक परंपरा के अनुसार नवविवाहिताएं मधुश्रावणी के दौरान 13 दिनों तक नियमपूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं. इस दौरान पति की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना की जाती है. मान्यता है कि इस अनुष्ठान से दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और स्थिरता बनी रहती है.

मधुश्रावणी की खास बात यह है कि इसकी पूजा महिलाओं द्वारा ही संपन्न करायी जाती है. पूजा कराने वाली महिलाओं को सम्मान के साथ ‘पंडितजी’ कहा जाता है. पर्व के दौरान मधुश्रावणी की कथा भी सुनाई जाती है.

नाग देवता की पूजा का विशेष महत्व

मधुश्रावणी पर्व में नागदेवता की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. नवविवाहिताएं प्रतिदिन बगीचों और खेतों से फूल-पत्तियां एकत्र करती हैं. हालांकि पूजा में एक दिन पहले तोड़े गए फूलों का ही इस्तेमाल किया जाता है. बासी फूलों से पूजा करने की यह परंपरा मधुश्रावणी को दूसरे पर्वों से अलग पहचान देती है.

लोकगीतों में सहेजी जा रही परंपरा

मधुश्रावणी सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मिथिला की समृद्ध लोक संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा पर्व भी है. पूजा के दौरान गाए जाने वाले पारंपरिक गीतों और सुनाई जाने वाली कथाओं के जरिए नवविवाहिताओं को दांपत्य जीवन से जुड़े संस्कार और सीख दी जाती है. फूल लोढ़ने की परंपरा में प्रकृति से जुड़ाव और सखियों के बीच आपसी प्रेम भी दिखाई देता है.

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Awadesh Kumar Das

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