पति बाहर कमाने गए, घर संभालने को महिला खुद साइकिल पर लेने पहुंची गैस सिलेंडर

Published by :Shruti Kumari
Published at :09 May 2026 9:08 AM (IST)
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पति बाहर कमाने गए, घर संभालने को महिला खुद साइकिल पर लेने पहुंची गैस सिलेंडर

साइकिल से गैस सिलेंडर लेने पहुंची महिला

शहर के मुख्य बाजार में एक महिला तेज धूप और गर्मी के बीच साइकिल पर एलपीजी सिलेंडर लादकर ले जाती दिखाई दी. यह दृश्य लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा था.

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मधेपुरा से अमन श्रीवास्तव की रिपोर्ट:

मधेपुरा: जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है. जो आज भी ग्रामीण जीवन की कठिन सच्चाई और व्यवस्था की कमियों को उजागर करती है. शहर के मुख्य बाजार में एक महिला तेज धूप और गर्मी के बीच साइकिल पर एलपीजी सिलेंडर लादकर ले जाती दिखाई दी. यह दृश्य लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा था.

जानकारी के अनुसार. महिला के पति रोजी-रोटी की तलाश में घर से दूर मजदूरी करते हैं. ऐसे में घर और बच्चों की पूरी जिम्मेदारी महिला के कंधों पर है. शुक्रवार को घर में खाना बनाने के दौरान गैस खत्म हो गई. सिलेंडर की जरूरत पड़ने पर महिला खुद पड़ोसी से साइकिल मांगकर बाजार पहुंची और गैस सिलेंडर लेकर वापस लौटती नजर आई.

महिला ने बताया कि गैस एजेंसी का वेंडर सिलेंडर घर पहुंचाने के लिए अतिरिक्त 100 रुपये मांगता है. पहले से ही एलपीजी सिलेंडर की कीमत 1000 रुपये से अधिक है. ऐसे में अतिरिक्त पैसे देना उसके लिए मुश्किल है. महिला ने कहा.
“100 रुपये बच जाएंगे तो उससे घर के लिए राशन का सामान आ जाएगा. इसलिए मैं खुद ही साइकिल से सिलेंडर लेने चली आई.”

लाल साड़ी पहने महिला जब सड़क पर साइकिल से सिलेंडर ले जा रही थी. तब तेज धूप और भारी गर्मी के बावजूद उसके हौसले कम नहीं दिखे. सड़क से गुजर रहे लोगों ने भी इस दृश्य को देखा और ग्रामीण महिलाओं के संघर्ष की चर्चा करने लगे.

स्थानीय लोगों का कहना है कि गांवों और छोटे शहरों में आज भी कई परिवार ऐसे हैं. जहां पुरुष रोजगार के लिए दूसरे राज्यों या शहरों में पलायन कर जाते हैं. पीछे घर की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है. राशन. बच्चों की देखभाल और गैस सिलेंडर जैसी जरूरतों का इंतजाम भी उन्हें खुद ही करना पड़ता है.

डिलीवरी सुविधा की कमी और अतिरिक्त शुल्क गरीब परिवारों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है. यही वजह है कि कई महिलाएं आज भी साइकिल या पैदल चलकर गैस सिलेंडर लाने को मजबूर हैं.

यह तस्वीर सिर्फ एक महिला की मेहनत और हिम्मत की कहानी नहीं कहती. बल्कि उन व्यवस्थाओं पर भी सवाल खड़े करती है. जो आज तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच सकी हैं.

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