बेटी ने मां की अर्थी को कंधा देकर दी मुखाग्नि, लोगों ने दी ये प्रतिक्रिया

Updated at : 23 Feb 2020 2:59 PM (IST)
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बेटी ने मां की अर्थी को कंधा देकर दी मुखाग्नि, लोगों ने दी ये प्रतिक्रिया

मधेपुरा : बिहारमें मधेपुराजिले के घैलाढ़में एक बेटी ने अपनी मां के अंतिम संस्कार में बेटे का फर्ज निभाते हुए कंधा दिया.साथ ही दसकर्म करने का निर्णयभी लिया. बेटी के इस साहस पर समाज के लोगों ने कहा, हमें अब बेटे और बेटियों के फर्क को भुलाना होगा. बेटी ने निभाया बेटा का फर्जश्रीनगर पंचायत […]

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मधेपुरा : बिहारमें मधेपुराजिले के घैलाढ़में एक बेटी ने अपनी मां के अंतिम संस्कार में बेटे का फर्ज निभाते हुए कंधा दिया.साथ ही दसकर्म करने का निर्णयभी लिया. बेटी के इस साहस पर समाज के लोगों ने कहा, हमें अब बेटे और बेटियों के फर्क को भुलाना होगा.

बेटी ने निभाया बेटा का फर्ज

श्रीनगर पंचायत के बेलोखरी गांव वार्ड नंबर 13 की रहने वाली 100 वर्षीय सीता देवी जी का निधन शनिवार को 11:00 बजे दिन के बीच हो गयी. एक बेटी ने बेटा का फर्ज निभाया. मां की मौत के बाद पति के साथ रह रही बेटी ने ही मां का अंतिम संस्कार किया. मां की मौत की जानकारी लगते ही फैमिली में मातम छा गया और सभी लोगों ने अपना आना शुरू कर दिया. लेकिन, स्वर्गीय सीता देवी के फैमिली में कोई बेटा ना होने के कारण बेटी ने मां को मुखाग्नि दी और ढोल बाजे के साथ उनकी अंतिम यात्रा निकाली.

ये थी मां की अंतिम इच्छा

बता दें कि स्वर्गीय सीता देवी जी के यहां सिर्फ एक ही संतान मंजू देवी थी और मां की अंतिम इच्छा थी कि उनकी चिता को उनकी बेटी ही आग देने की रस्म करें. अपनी मां की अंतिम इच्छा बेटी मंजू देवी ने पूरी हिंदू रीति रिवाज के साथ पूरी की जो कि आज समाज में एक मिसाल है. इस श्रीनगर पंचायत अंतर्गत जिसने भी यह नजारा देखा उनकी आंखें नम हो गयी और इस बेटी के प्रति श्रद्धा से सिर झुक गया.

लोगों को कुछ अजीब सा लगा, लेकिन…
मंजू देवी ने बताया कि मुझे नहीं पता था कि मां के अंतिम संस्कार और दसकर्म की क्रिया को करने के लिए भूमि दान में देनी पड़ेगी. ऐसे में मैने खुद निर्णय लिया. मेरा कोई सगा भाई नहीं होने पर मैंने अपनी मां का अंतिम संस्कार भी किया. जब गांव में मैंने अपनी मां के सभी कर्म को खुद करने के लिए तैयार हो गयी तो लोगों को कुछ अजीब सा लगा, लेकिन मेरी आत्मा को शांति मिल रही थी. मैंने पिंडदान से लेकर सभी कर्म करने का निर्णय लिया हूं. मेरे इस कर्म से उन बेटियों को साहस मिलेगा जो माता-पिता का दस कर्म और पिंडदान कर अपनी भूमि दान देने से बच सकती है. वैसे मां के दस कर्म में बेटी बेटा का बंद होना चाहिए.

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