हुनर को नहीं छुपा सका वक्त, 56 की उम्र में जीविका दीदी फुलवंती बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

Published by :Divyanshu Prashant
Published at :11 May 2026 12:22 PM (IST)
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हुनर को नहीं छुपा सका वक्त, 56 की उम्र में जीविका दीदी फुलवंती बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

फुलवंती कुमारी

लखीसराय की 56 वर्षीय फुलवंती कुमारी ने जीविका के सहयोग से अपने सालों पुराने सिलाई के हुनर को जगाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है. आज वह आंगनवाड़ी के लिए पोशाक सिलकर न केवल प्रतिमाह 8 हजार रुपये कमा रही हैं, बल्कि सिलाई केंद्र के जरिए 50 से अधिक अन्य महिलाओं को भी रोजगार का साधन मिला है.

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लखीसराय से राजेश कुमार की खबर: कहते हैं प्रतिभा और हुनर को कोई बांधकर या छिपाकर नहीं रख सकता. मौका मिलते ही वह बाहर आती है और सम्मान के साथ स्वावलंबन की मजबूत नींव रख देती है. लखीसराय जिले के औरै पंचायत अंतर्गत शिवनगर निवासी फुलवंती कुमारी की कहानी इसका जीता-जागता उदाहरण है, जिन्होंने 56 वर्ष की उम्र में अपने हुनर के दम पर न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि समाज के लिए भी एक मिसाल बन गई हैं.

15 साल की उम्र में शादी, पर्दे में रह गया था हुनर

लगभग 45 साल पहले महज 15 वर्ष की उम्र में फुलवंती की शादी शिवनगर निवासी दिलावर महतो से हुई थी. मायके में मां ने उन्हें सिलाई-कटाई और खाना बनाने का हुनर सिखाया था. ससुराल में रसोई का काम तो खूब आया, लेकिन सिलाई-कटाई की कला सालों तक घर की चारदीवारी और जिम्मेदारियों के पर्दे में ही कैद रही. फुलवंती के मन में इसे आत्मनिर्भरता से जोड़ने की ललक थी, लेकिन मौका नहीं मिल पा रहा था. उनके पति खेतों में मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते थे.

जीविका बनी सहारा, 10 हजार से शुरू किया स्वरोजगार

फुलवंती की जिंदगी में नया मोड़ वर्ष 2015 में आया, जब वह ‘दुर्गा रानी जीविका महिला स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ीं. यह समूह सहेली जीविका महिला ग्राम संगठन से संबद्ध है. मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत उन्हें 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिली. इस राशि से उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी और अपने हुनर को जगाते हुए स्वरोजगार शुरू कर दिया. यहीं से उनकी आमदनी का सिलसिला शुरू हो गया.

हर दिन 10 पोशाक की सिलाई, 8 हजार तक की हो रही कमाई

इसी बीच जीविका दीदियों की परिकल्पना से रामगढ़ चौक प्रखंड में सिलाई सह उत्पादन केंद्र ने काम शुरू किया. इस साल 18 फरवरी से यहां आंगनवाड़ी केंद्रों के छात्र-छात्राओं के लिए पोशाक निर्माण का कार्य शुरू हुआ. फुलवंती देवी के हुनर और अनुभव को देखते हुए उन्हें इस केंद्र से जोड़ा गया. आज फुलवंती प्रतिदिन लगभग 10 पोशाक सिल लेती हैं, जिसके एवज में उन्हें प्रतिमाह 7 से 8 हजार रुपये की आमदनी हो रही है.

50 से अधिक महिलाओं को मिला रोजगार, समाज में बढ़ा सम्मान

रामगढ़ चौक स्थित उपकार जीविका महिला संकुल स्तरीय संघ द्वारा संचालित इस सिलाई केंद्र ने फुलवंती के साथ-साथ इलाके की 50 से अधिक महिलाओं को रोजगार से जोड़ा है. यहां तैयार किए गए पोशाक मांग के अनुरूप आंगनवाड़ी केंद्रों को आपूर्ति किए जा रहे हैं. 56 की उम्र में आत्मनिर्भर बनीं फुलवंती काफी खुश हैं कि जीविका ने उनके हुनर को नई पहचान दिलाई. इस काम से उन्हें न सिर्फ समाज में प्रतिष्ठा मिली है, बल्कि उनके परिवार को जीवनयापन का एक मजबूत व नया सहारा भी मिल गया है.

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