मंत्री पद की रेस से गोपाल अग्रवाल के बाहर होने पर गरमायी सीमांचल की सियासत

Published by :AWADHESH KUMAR
Published at :10 May 2026 8:52 PM (IST)
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मंत्री पद की रेस से गोपाल अग्रवाल के बाहर होने पर गरमायी सीमांचल की सियासत

मंत्री पद की रेस से गोपाल अग्रवाल के बाहर होने पर गरमायी सीमांचल की सियासत

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ठाकुरगंज विधायक को जगह न मिलने से समर्थकों में मायूसी, क्षेत्र के पिछड़ेपन पर फिर शुरू हुई बहस

ठाकुरगंज. बिहार सरकार के नए सम्राट मंत्रिमंडल विस्तार में किशनगंज जिले के एकमात्र जदयू विधायक गोपाल अग्रवाल को मंत्री पद नहीं मिलने के बाद सीमांचल की राजनीति में नयी बहस शुरू हो गयी है. लगातार दूसरी बार ठाकुरगंज विधानसभा से जीत दर्ज करने वाले गोपाल अग्रवाल को मंत्री बनाए जाने की चर्चा लंबे समय से चल रही थी, लेकिन अंतिम सूची में नाम नहीं आने से समर्थकों के साथ-साथ सीमांचल के राजनीतिक जानकार भी हैरानी जता रहे हैं. सीमांचल को बिहार के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है. शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, सड़क, बाढ़ नियंत्रण और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर यह इलाका वर्षों से उपेक्षा का दंश झेलता रहा है. किशनगंज, ठाकुरगंज, बहादुरगंज व आसपास के इलाकों में आज भी बड़ी आबादी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, उच्च शिक्षा संस्थानों और रोजगार के अवसरों से वंचित है. ऐसे में स्थानीय लोगों का मानना है कि सरकार में मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व इस क्षेत्र की आवाज को मजबूती दे सकता था. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सीमांचल में पिछले कुछ वर्षों में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का प्रभाव तेजी से बढ़ा है. वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल की कई सीटों पर एआइएमआइएम ने मजबूत प्रदर्शन कर पारंपरिक दलों की चिंता बढ़ा दी थी. इसके बाद से लगातार यह चर्चा होती रही है कि यदि मुख्यधारा की पार्टियां सीमांचल को पर्याप्त राजनीतिक भागीदारी व विकास नहीं देंगी, तो क्षेत्र में वैकल्पिक राजनीति व अधिक मजबूत हो सकती है. ऐसे माहौल में ठाकुरगंज जैसे महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं मिलना राजनीतिक रूप से भी अहम माना जा रहा है. खास बात यह है कि किशनगंज जिले से जदयू का प्रतिनिधित्व केवल ठाकुरगंज से ही है, बावजूद इसके जिले को मंत्री पद से वंचित रखा गया. ठाकुरगंज विधानसभा का राजनीतिक इतिहास भी काफी मजबूत रहा है. पूर्व विधायक मोहम्मद हुसैन आजाद वर्ष 1969-70 में बिहार सरकार में मंत्री बने थे. बाद में उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी निभायी. वहीं मोहम्मद सुलेमान भी बिहार सरकार में मंत्री पद तक पहुंचे थे. वर्ष 2014–15 में नौशाद आलम को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री बनाया गया था. उस समय सीमांचल को सरकार में मजबूत भागीदारी मिलने की चर्चा हुई थी. अब एक बार फिर मंत्री पद नहीं मिलने के बाद क्षेत्र में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या सीमांचल केवल चुनावी राजनीति तक ही सीमित होकर रह गया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकार सच में सीमांचल के पिछड़ेपन को दूर करना चाहती है, तो क्षेत्र को केवल आश्वासन नहीं बल्कि सत्ता में मजबूत भागीदारी भी देनी होगी.

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