पढ़ाई के साथ-साथ बीमारी भी बांट रहे प्राइवेट स्कूल

पढ़ाई के साथ-साथ बीमारी भी बांट रहे प्राइवेट स्कूल प्राइवेट स्कूलों में बदलती व मोटी होती किताबों वाले बस्ते के बोझ से दबे जा रहे बच्चे बच्चों में पीठ दर्द सहित कई बीमारियों के शिकार होने की आशंका, अभिभावक मजबूर प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगाने में शिक्षा विभाग विफल फीस में हर साल […]
पढ़ाई के साथ-साथ बीमारी भी बांट रहे प्राइवेट स्कूल प्राइवेट स्कूलों में बदलती व मोटी होती किताबों वाले बस्ते के बोझ से दबे जा रहे बच्चे बच्चों में पीठ दर्द सहित कई बीमारियों के शिकार होने की आशंका, अभिभावक मजबूर प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगाने में शिक्षा विभाग विफल फीस में हर साल हो रही बढ़ोतरी अभिभावकों की आर्थिक स्थिति पर पड़ा असर किताब से लेकर कॉपी तक की कंपनी तय, दुकान फिक्स कर होता है शोषण —————-प्राइवेट स्कूलों में मनमानी के आलम के बीच बस्ते के बोझ से बच्चे कराह रहे हैं. बस्ते का बोझ कम करने के लिए सरकारी फरमान अभी तक फाइलों में दबे होने से स्थिति जस की तस बनी हुई है. निजी स्कूलों में अभिभावकों को आकर्षित करने के नाम पर अनावश्यक कॉपी किताब से बस्ते की बोझ बढ़ा कर बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. स्कूल व घर के टेलीफोन नंबर की नोट बुक, खेल बुक और अन्य विषयों के लिए चित्र बुक, पानी बोतल, टिफिन जैसे चीजों के नाम पर शोषण का सिलसिला जारी है. फीस लेकर हर मोड़ पर अभिभावकों की जेब ढीली होने पर लगाम नहीं लग पाया है. ———————-प्रतिनिधि, खगड़िया. प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई के साथ साथ बीमारी भी बांटी जा रही है. इधर बस्ते के बोझ से बच्चे कराह रहे हैं तो दूसरी ओर फीस देने में अभिभावक के पसीने छूट रहे हैं. इन सारी परेशानियों के बीच शिक्षा विभाग नींद में है. दिन ब दिन मोटे होते बस्ते से बच्चे के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की प्रबल आशंका के बीच अभिभावक बेबस हैं. प्राइवेट स्कूल संचालक का सीधा फरमान होता है कि यहां पढ़ाना है तो स्कूल के नियम कायदे मानने होंगे. शिक्षा के अधिकार के नियम के तहत गरीब बच्चों के नामांकन की स्थिति काफी कमजोर हैं. लेकिन अधिकारी के आंखे फेर लेने से स्थिति दिन ब दिन भयावह होती जा रही है. ———————–बच्चों की बेबसी से शिक्षा विभाग बेखबर निजी स्कूलों की मनमानी में पीस रहे अभिभावक व मासूम बच्चों की परेशानियों से शिक्षा विभाग के अधिकारी बेखबर हैं. चाहे गरीब बच्चों के नामांकन की बात हो या फिर दूसरी मनमानी पर रोक लगाने का मामला हो. दिनों दिन मोटे होते बस्ते के अनावश्यक बोझ से बच्चों में कई बीमारी के शिकार होने का खतरा बढ़ गया है. निजी स्कूलों में संचालित हो रही मनमानी गतिविधियों की प्रशासनिक अमला द्वारा जांच नहीं किए जाने से ज्यादातर स्कूलों में अनावश्यक किताबों का बोझ बच्चों के कंधों पर डाल दिया गया है. इस बोझ से बच्चों के शारीरिक विकास पर भी विपरीत प्रभाव पड़ने की बात सामने आई है. लेकिन निजी स्कूल संचालकों पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ रहा है. बच्चे कराह रहे हैं अभिभावक विवश हैं, शिक्षा विभाग लापरवाह बना हुआ ऐसे हालात में स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है. —————– ऑफ द रिकार्ड बोले अधिकारी शिक्षा विभाग के अधिकारी कहते हैं नन्हें बच्चों पर जरूरत से ज्यादा बस्ते का बोझ खतरनाक हैं. वे कहते हैं कि सभी निजी और सरकारी स्कूलों में निर्धारित मापदंड की जानकारी दी जा चुकी है. ऐसे मामलों में कोई शिकायत नहीं मिलने से कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है. इधर, शहर में अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई के नाम पर निजी स्कूल प्रबंधन की मनमानी का सिलसिला जारी है. प्रत्येक वर्ष नामांकन फीस, किताब कब बदल जायेगी कोई गारंटी नहीं, किताब की छोड़िये कॉपी का कंपनी भी फिक्स, दुकान भी निश्चित ऐसे कई सवाल हैं जो लोगों को कुरेद रहा है. ————— सिर्फ कहने के लिये हैं सरकारी मापदंड प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर नकेल कसने के लिये भले ही तरह तरह के नियम कायदे बना दिये गये हो लेकिन स्थिति में ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है. ताजा उदाहरण सुन कर आप चौंक जायेंगे. पहले से किताब कॉपी के बाद अब बोतल भी स्कूल प्रबंधन ही पैसे लेकर दे रहा है. अभिभावक अशोक कुमार, अवधेश मिश्रा ने कहा कि बस्ते की बोझ के मामले में लापरवाही बच्चों को कमजोर बना सकती है. शिक्षा के अधिकार के तहत कमजोर वर्ग के बच्चों के नामांकन की जांच हो तो अधिकांश स्कूलों की पोल खुल जायेगी. लेकिन जांच की किसको फुरसत हैं. —————-अनावश्यक बोझ बच्चों के कमजोर होने का खतरा गोगरी अस्पताल के प्रभारी डॉ. अरविन्द कुमार का कहना था कि कम उम्र में बच्चों की देखरेख में की गई लापरवाही आगे चल कर भारी पड़ सकती है. छोटी उम्र में बच्चों की हड्डियां पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती है. ऐसे में जरूरत से ज्यादा बोझ डालने से आगे चलकर परेशानी हो सकती है. इस उम्र में बोझ के चलते पीठ का दर्द, गरदन में परेशानी की शिकायत हो सकती है. इसके लिये विद्यालय प्रबंधन को जरूर सोचना चाहिये.
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