चांदी के जेवर निर्माण का केंद्र बना सलारपुर

Published at :05 Jul 2015 9:06 AM (IST)
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चांदी के जेवर निर्माण का केंद्र बना सलारपुर

परबत्ता: प्रखंड के कुल्हड़िया पंचायत अंतर्गत सलारपुर गांव को गंगा का बार-बार कटाव भी उसके समृद्ध विरासत को जुदा नहीं कर सकी. आज भी गांव के स्वर्णकार टोला में विगत सौ वर्षो से जेवर निर्माण के क्षेत्र में पीढ़ी दर पीढी कार्य कर स्वरोजगार के क्षेत्र में एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है. इस टोला […]

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परबत्ता: प्रखंड के कुल्हड़िया पंचायत अंतर्गत सलारपुर गांव को गंगा का बार-बार कटाव भी उसके समृद्ध विरासत को जुदा नहीं कर सकी. आज भी गांव के स्वर्णकार टोला में विगत सौ वर्षो से जेवर निर्माण के क्षेत्र में पीढ़ी दर पीढी कार्य कर स्वरोजगार के क्षेत्र में एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है. इस टोला के बीस स्वर्णकार परिवार चांदी के जेवर का निर्माण करते हैं. इसमें अमृती बाला, हाथ में पहनने वाला छंद , गले की हंसुली, पायल तथा चांदी के मोटे जेवर शामिल हैं.

आज भी इन जेवरों के निर्माण में पुराने तौर – तरीके एवं औजारों का प्रयोग किया जाता है. यहां प्रत्येक सामान हाथ से बनाया जाता है. कई दशकों के गुजरने के बाद भी कारीगरी में केवल इतना ही अंतर हुआ है कि अब ताप के लिये किरोसिन की बजाय गैस का उपयोग होने लगा है. परबत्ता प्रखंड का इस सबसे पुराने जेवर निर्माण केंद्र की बनायी हुई दुल्हन पायल की मांग आज भी बाजार में बनी हुई है. यहां के कारीगर बतातें हैं कि जापानी मशीनों के आने के बाद से जेवर निर्माण के क्षेत्र में हल्के आभूषणों का प्रचलन बढा है.

महंगाई भी कम वजन के हल्के जेवरों की बिक्री बढाने में सहायक हुआ. फिर भी यहां के बनाये हुए जेवरों की इतनी मांग जरुर है कि यहां के कारीगरों की दाल – रोटी चल जाती है. कारीगर बताते हैं कि जेवर निर्माण के कार्य में घर के सभी सदस्य, यहां तक कि महिलाएं व बच्चे भी कुछ न कुछ योगदान करते हैं. इस प्रकार घर में रहकर सम्मान के साथ जीवन चल जाता है. मूलभूत सुविधाओं के अभाव के बावजूद ये सभी कार्य में मग्न एवं खुश रहते हैं. उच्च डिग्रीधारी युवा भी इस कार्य में प्रवृत्त होने में संकोच नहीं करते हैं. इसे आज के समय में अपवाद भी कहा जा सकता है. यदि इनमें से किसी के घर के युवा को नौकरी लग जाती है तो अच्छा , अन्यथा घर का काम तो हाथ में ही रहता है. जेवर निर्माण का यह हुनर एक पीढी से दूसरी पीढी में स्वत: हस्तांतरित होती जाती है. आत्मनिर्भरता से लबरेज इस गली आज बैलगाड़ी या ट्रैक्टर को गुजरने में भले ही परेशानी हो. किंतु इन 20.

-25 स्वर्णकार परिवारों का जीवन सुगम व सम्मानजनक है तथा इसे बनाने में इस परंपरागत हुनर का बड़ा योगदान है. विगत एक दशक में परबत्ता बाजार में तीन दर्जन से अधिक ज्वेलर्स की दुकाने खुली. किंतु इसमें अधिकांश केवल खरीद बिक्री करने वाले व्यवसायी हैं. धातु को रुप आकार देकर जेवर बनाने वाले शिल्पकार नहीं हैं. इन शिल्पकारों एवं कुटीर उद्योग के स्तर पर जेवर निर्माण करने वाले कारीगरों के कल्याण के लिये भले ही कोई सरकारी या गैरसरकारी महकमा सामने नहीं आये. ये किसी रियायत या सहायता की उम्मीद भी नहीं रखते हैं.

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