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कुर्बानी भिट्टा के बुजुर्गों को नहीं मिलता पेंशन योजना का लाभ

Updated at : 21 Nov 2024 10:45 PM (IST)
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विकास की रोशनी से कोसो दूर है आदिवासी बाहुल्य गांव कुर्बानी भिट्टा

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कटिहार. जिले में अभी भी ऐसे कई आदिवासी बाहुल्य गांव है, जो न केवल बुनियादी सुविधा से महरूम है. बल्कि सरकार के दावों को भी खोखला साबित करने के लिए काफी है. साथ ही सरकार के सबका साथ सबका विकास और राज्य सरकार के न्याय के साथ विकास की अवधारणा को ऐसे गांव मुंह चिढ़ा रही है. जिला मुख्यालय से महज सात-आठ किलोमीटर की दूरी पर कटिहार सदर प्रखंड अंतर्गत कुर्बानी भिट्टा गांव है. यह गांव आदिवासी बाहुल्य गांव है. इस गांव में कई बुजुर्ग है, जिन्हें अब तक पेंशन योजना का लाभ भी नहीं मिला है. गांव के प्रधान मरांडी का उम्र 80 वर्ष है, जबकि दुबई मरांडी का उम्र 70 वर्ष व मरियम सोरेन का उम्र 65 वर्ष है. लेकिन इनकों आज तक योजना का लाभ नहीं मिल पाया है. इधर, गरभेली पंचायत के वार्ड सात के इस गांव के लोगों को सड़क, स्वास्थ्य, सुरक्षित पेयजल, आवास, आंगनबाड़ी केंद्र जैसी अत्यंत बुनियादी जरूरत भी मयस्सर नहीं है. विकास व कल्याण को लेकर सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे कर रही हो. पर कुर्बानी भिट्टा का आदिवासी गांव खुद हकीकत बयां करने के लिए काफी है. आवागमन का कोई साधन नहीं गांव आने-जाने के लिए सड़क भी लोगों को नसीब नहीं है. कटिहार जिला मुख्यालय से बेगना, मधेपुरा, बठेली होते हुए एक पक्की सड़क आती है. यह सड़क इसी आदिवासी गांव होकर डंडखोरा, बलुआ टोला, पररिया की ओर जाता है. पर कटिहार से यह सड़क बठेली तक पक्की है. स्थानीय ग्रामीण दशरथ मरांडी ने बातचीत में कहा कि बठेली से कुर्बानी भिट्टा गांव तक गड्ढे में तब्दील ईंट सोलिंग सड़क है. स्थानीय लोगों ने बताया कि यह करीब 400 मीटर सड़क है, जो ईंट सोलिंग है. लोहों ने बताया कि करीब 20-25 साल पहले यह ईंट सोलिंग सड़क बना था, जो अब गड्ढे में तब्दील हो चुका है. लोगों ने बताया कि खासकर बरसात के दिनों में न केवल इस गांव के लोगों को अत्यधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है. बल्कि इस होकर डंडखोरा-कटिहार जाने वाले लोगों को भी परेशानी झेलनी पड़ती है. लोगों ने यह भी बताया कि 2017 के बाढ़ में समीप के खानाधार पुल ध्वस्त हो गया था, जो अब तक नहीं बना है. शौचालय व आंगनबाड़ी केंद्र का लाभ नहीं इस गांव के अधिकांश आदिवासी परिवार के घरों में शौचालय नहीं है. शौचालय योजना का लाभ नहीं मिला है. साथ ही यह भी कहा कि इस गांव में आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है. गांव के सुरेंद्र मरांडी ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र इस गांव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है. जहां बच्चों को जाना संभव नहीं है. ग्रामीणों ने बताया कि कई ऐसे परिवार है. जिन्हें अब तक राशन कार्ड उपलब्ध नहीं हो सका है. गांव में कई बुजुर्ग है, जिन्हें पेंशन योजना का लाभ भी नहीं मिला है. प्रधान मरांडी का उम्र 80 वर्ष है. जबकि दुबई मरांडी का उम्र 70 वर्ष व मरियम सोरेन का उम्र 65 वर्ष है. पर इन्हें पेंशन नहीं मिला है. दूसरी तरफ राजेश सोरेन दिव्यांग है. इसकी उम्र करीब 23 वर्ष है तथा इंटर पास है. लेकिन दिव्यांगता प्रमाण पत्र नहीं बना है. बातचीत में स्थानीय लोगों ने यह भी कहा कि धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. कहती हैं मुखिया गरभेली पंचायत की मुखिया रंजना कुमारी ने कहा कि कुर्बानी भिट्टा गांव आदिवासी बाहुल्य है. उस गांव के नाम से दूसरे जगह आंगनबाड़ी केंद्र है. पर दूरी की वजह से उस गांव के बच्चे नहीं आते है. गांव का ईंट सोलिंग सड़क जर्जर है. यह मुख्य सड़क है. इसलिए संबंधित विभाग के स्तर से सड़क निर्माण की दिशा में पहल होनी चाहिए.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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