गोगाबील झील समेत सात जलाशयों में पक्षियों की हुई गणना

Published at :18 Feb 2025 7:16 PM (IST)
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गोगाबील झील समेत सात जलाशयों में पक्षियों की हुई गणना

एशियाई मध्य शीतकालीन जल पक्षी गणना कार्यक्रम 2025 के तहत राज्य के अति समृद्ध पक्षी क्षेत्र गोगाबील के साथ कटिहार जिले के सात जलाशयों में पक्षियों की गणना की गयी.

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गोगाबील झील में बढ़ी देशी व विदेशी पक्षियों की संख्या

पक्षीविद अरविंद मिश्रा की निगरानी में हुई पक्षियों की गणना

मनिहारी. बिहार के एशियाई मध्य शीतकालीन जल पक्षी गणना कार्यक्रम 2025 के तहत राज्य के अति समृद्ध पक्षी क्षेत्र गोगाबील के साथ कटिहार जिले के सात जलाशयों में पक्षियों की गणना की गयी. 16 और 17 फ़रवरी को गणना हुई. गोगाबील झील के अलावा गेड़ाबाड़ी पार्क, भवारा कोठी, मनिहारी के निकट ईंट भट्ठा के पास कनचिरा, बल्दिया चौर, कठौतिया पौंड, बघार बील भी शामिल है. पक्षियों की गणना बिहार के जाने-माने पक्षीविद अरविन्द मिश्रा के नेतृत्व में की गयी. इस टीम में भागलपुर के बिट्टू कुमार व गरुडों के प्रजनन स्थल कदवा दियारा के संतोष कुमार, गेड़ाबाड़ी के अंशुमन जयपुरियार, भवारा कोठी के अमरेश कुमार चौधरी व राजन कुमार भी शामिल थे. मनिहारी, अमदाबाद के वनरक्षी नीतीश कुमार, सुरेन्द्र कुमार भी इस गणना में शामिल रहे. कटिहार के वन क्षेत्र पदाधिकारी सत्येन्द्र झा, वन प्रमंडल पदाधिकारी राजीव रंजन का इस कार्यक्रम में भरपूर सहयोग रहा. पक्षीविद अरविंद कुमार मिश्रा ने बताया कि इस वर्ष गणना में गोगाबील झील में देशी व विदेशी पक्षी की संख्या बढ़ी है. 2019 में गोगा बील को बिहार के एकमात्र कम्युनिटी रिजर्व और कन्जेर्वेशन रिजर्व के रूप में घोषित भी किया गया है. यहां पक्षी गणना में अरविंद मिश्रा के अलावा बिट्टू कुमार, संतोष कुमार, श्वेता कश्यप, अभिषेक तिवारी, सिताबुद्दीन और स्थानीय वनरक्षी भी शामिल थे. पिछले माह सीएम नीतीश कुमार के आगमन को लेकर अधिकारियों का गोगाबील में खूब दौरा रहा. जिस कारण झील में नौकाओं का परिचालन लगभग बंद रहा. इसका असर यहां देसी और प्रवासी पक्षियों की संख्या पर स्पष्ट नजर आया. गोगा में यहां रिकॉर्ड संख्या में 8500 से 9000 पक्षी देखे गये. सबसे ज्यादा लेसर व्हिसलिंग डक यानि छोटी सिल्ली करीब 4500 चार हजार की की संख्या में दिखे. फल्वस व्हिसलिंग डक यानि बड़ी सिल्ली जो राज्य में अन्यत्र बहुत कम दिखाई देती है. वो भी करीब 400 की संख्या में मिले. प्रवासी पक्षियों में रेड क्रेस्टेड पोचार्ड यानि लालसर भी करीब 2000 की संख्या में देखे गये. इनके अलावा गडवाल यानि मैल, कॉमन पोचार्ड यानि बुरार, नोर्दर्न पिनटेल सींखपर, व्हाइट आइड पोचार्ड यानि कर्चिया बतख और टफटेड डक यानि कलसिरा बतख, गार्गेनी यानि चैता, यूरेशियन कूट यानि सरार, ग्रेट क्रेस्टेड ग्रीब यानि शिवा हंस बी यहां दिखे. सबसे खुशी तो तब हुई जब यहां नोर्दर्न लैपविंग यानि शाबाज़ टिट्टी या काली टिटहरी का झुंड इस बार भी देखने को मिला. गोगाबील आने वाले पक्षी प्रेमियों की यह चाहत होती है कि यह पक्षी उन्हें देखने को मिल जाय. बघार बील में भी देसी एवं प्रवासी पक्षियों की अच्छी संख्या देखने को मिली. मगर खासियत यह रही कि यहां 50 से भी ज्यादा संख्या में ग्लॉसी आइबिस यानि कौआरी बुज्जा भी देखने को मिले. बिहार राज्य में अन्यत्र कभी-कभी ही दिखते है. यह कार्य वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, बिहार सरकार के सहयोग से किया जा रहा है. इस गणना में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) का तकनीकि सहयोग शामिल है. पिछले वर्ष राज्य के 87 जलाशयों में जल पक्षी गणना का कार्य किया गया था. जबकि इस वर्ष 110 से भी ज्यादा जलाशयों को इसमें शामिल किया जा रहा है. राज्य के महत्वपूर्ण जलाशयों में पक्षियों की गणना का मुख्य उद्देश्य जलाशयों की वर्तमान स्थिति का आकलन, उन पर मंडराते खतरों का अध्ययन और जलाशयों के प्रति आम लोगों में जागरूकता और उनकी सहभागिता को बढ़ाना है. किसी भी जलाशय की स्थिति की प्रथम सूचना पक्षियों की उपस्थिति से ही हमें प्राप्त होती है. गेड़ाबाड़ी पार्क अब पर्यटकों का क्षेत्र बन चूका है. इसलिए जल पक्षियों की संख्या तो कम दिखाई पड़ी. पर पेड़ों पर रहने वाले पक्षियों की अच्छी विविधता दिखी. भवरा कोठी के तालाबों में 250 से अधिक लेसर व्हिसलिंग डक यानि छोटी सिल्ली के साथ विश्व भर में पक्षियों की संकटग्रस्त सूची में शामिल 50 व्हाईट आइड पोचार्ड यानि कर्चिया बतख और एक टफटेड डक यानि कलसिरा बतख भी दिखे. ये दोनों ही प्रजातियां प्रवासी है. कनचिरा जल स्थल में जल की स्थिति बहुत कम हो जाने के कारण पक्षी कम दिखे. फिर भी प्रवासी पक्षी व्हाईट वैगटेल यानि सफ़ेद खंजन और रोजी पिपीट यानि गुलाबी चरचरी दिखाई दिया. यहां धान के बिचड़े की बुआई भी शुरू हो चुकी है. बल्दिया चौर में भी अधिवास की विविधता के कारण अच्छे- खासे पक्षी दिखाई देते हैं. इस चौर में अब मछली मारने के ठेके का असर देखने को मिला तो दूसरी ओर मखाना की खेती की तैयारी भी शुरू थी.

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