आधी आबादी को नहीं मिल रहा लाभ

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पंचायती राज व्यवस्था . महिला आरक्षण, आधी हकीकत आधा फंसाना आधी आबादी को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में 50 प्रतिशत आरक्षण का लाभ तो मिल गया है, लेकिन इसका सही उपयोग महिला जनप्रतिनिधि नहीं कर पा रही हैं. उनका काम पुरुष रिश्तेदार करते नजर आते हैं. कटिहार : यूं तो राज्य सरकार ने आधी आबादी […]

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पंचायती राज व्यवस्था . महिला आरक्षण, आधी हकीकत आधा फंसाना

आधी आबादी को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में 50 प्रतिशत आरक्षण का लाभ तो मिल गया है, लेकिन इसका सही उपयोग महिला जनप्रतिनिधि नहीं कर पा रही हैं. उनका काम पुरुष रिश्तेदार करते नजर आते हैं.
कटिहार : यूं तो राज्य सरकार ने आधी आबादी को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उनके सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है. पर उसका लाभ आधी आबादी को नहीं मिल पा रहा है. महिलाओं को पंचायत चुनाव में आरक्षण दिये एक दशक से ज्यादा हो चुका है. इस एक दशक बीतने के बावजूद अब भी पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं हुआ है. भले ही आरक्षण के बदौलत आधी आबादी पंचायत के सरकार में आ गयी है, लेकिन उनके निर्णय पर पुरुषों की पहरेदारी होती है. खासकर निर्वाचित महिला पंचायत प्रतिनिधि के रिश्तेदार का ही जोर ही चलता है.
जब वर्ष 2006 में पहली बार राज्य सरकार ने महिलाओं को पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण दिया , तो पंचायत सरकार में महिलाओं की तादाद अधिक हो गयी. तब महिला मुखिया, महिला सरपंच, महिला प्रमुख आदि के एमपी, एसपी, पीपी आदि के नाम से जाना जाता था. महिला जनप्रतिनिधि के बजाय समाज में उनके पति या रिश्तेदार का वर्चस्व होता था.
वर्ष 2011 के चुनाव के बाद तक यही स्थिति रहा. लेकिन जब वर्ष 2016 में पंचायत चुनाव हुआ तो इसमें थोड़ा सा बदलाव देखने को मिल रहा है. अब महिला पंचायत जन प्रतिनिधि के पति प्रतिनिधि के रूप में जाने जाते है. यानी मुखिया प्रतिनिधि, सरपंच प्रतिनिधि, प्रमुख प्रतिनिधि, जिप प्रतिनिधि, पंसस प्रतिनिधि के रूप में अपने को घोषित कर लिया है.
स्थानीय शासन प्रशासन भी अघोषित रूप से इसका समर्थन कर रहे है. अगर यही स्थिति रही तो राज्य सरकार के महिला सशक्तिकरण के दावे की हवा निकल जायेगी. प्रशासन के मौन सहमति भी पुरुष वर्ग के हौसले को बढ़ा रहा है.
महिला जनप्रतिनिधि को मिले नेतृत्व का लाभ नहीं मिल पाता:
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2006 में जब पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया तो देश दुनिया में इसकी अच्छी चर्चा हुई. इस आरक्षण के बाद महिलाओं के नेतृत्व में पूर्व की तुलना आगे बढ़ा है. पर आज भी सभी महिला जनप्रतिनिधि को मिले नेतृत्व का अवसर का लाभ नहीं मिल पाता है.
ज्यादातर महिला जनप्रतिनिधि के निर्णय में या तो उसके पति का पहरा रहता है या फिर उनके नजदीकी रिश्तेदार ही फैसले लेते है. हालांकि कई क्षेत्रों में महिला मुखिया व प्रमुख अपने अधिकार का उपयोग पंचायत को बेहतर बनाने की कोशिश में जुटी हुई है, लेकिन अधिकांश महिला जनप्रतिनिधि की स्थिति ऐसी नहीं है.
फलस्वरूप राज्य सरकार का दिया हुआ आरक्षण व्यवस्था महिलाओं के लिए आधी हकीकत-आधा फंसाना साबित हो रहा है.
प्रतिनिधि बन पति निबटाते हैं काम
वर्ष 2006 में पहली बार पंचायत चुनाव में मिले आरक्षण की वजह से आधी आबादी आधे से अधिक सीट पर जीत हासिल की थी. उस समय महिला मुखिया का अधिकांश काम उनके पति निपटा देते थे. स्थानीय स्तर पर उसे मुखिया पति (एमपी) के नाम से जाना जाता था, जबकि महिला सरपंच व महिला प्रमुख के पति को क्रमशः सरपंच पति (एसपी)व प्रमुख पति (पीपी) के रूप से लोग बुलाते थे. यह उपनाम वर्ष 2011 के चुनाव के बाद भी जारी रहा,
लेकिन जब वर्ष 2016 में पंचायत चुनाव हुआ, तो उसके बाद से मुखिया पति की जगह मुखिया प्रतिनिधि, सरपंच की जगह सरपंच प्रतिनिधि तथा प्रमुख की जगह प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में उनके पति या करीबी रिश्तेदार भूमिका निभाते है. हालांकि ग्राम सभा, ग्राम कचहरी तथा पंचायत समिति की बैठक में मीडिया की वजह से महिला पंचायत प्रतिनिधि के पति या उनके रिश्तेदार शामिल नहीं होते है. पर अन्य कोई सरकारी कार्यक्रम या मांग पत्र देना हो तो उनके पति या करीबी रिश्तेदार यह काम महिला पंचायत जन प्रतिनिधि के रूप में निभाते हैं
प्रशासन की भी रहती है मौन सहमति
महिला पंचायत प्रतिनिधि के स्थान पर उसके पति या करीबी रिश्तेदार ही अधिकांश मामलों में निर्णय लेते हैं. पंचायत या प्रखंड की कोई समस्या हो तो पंचायत के महिला जन प्रतिनिधि के रूप में उनके पति या रिश्तेदार ही प्रशासनिक अधिकारी के पास पहुंच कर मांग पत्र देते हैं. साथ ही सरकारी व गैरसरकारी कार्यक्रमों में महिला पंचायत प्रतिनिधि के पति व रिश्तेदार ही प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लेते हैं. दरअसल इस मामले में प्रशासन की मौन सहमति रहती है.
यही वजह है कि महिला जनप्रतिनिधि अधिकांश मामलों में उपेक्षित रहती है. हालांकि जिले में कई ऐसे पंचायत भी है जहां आरक्षण के रुप में अवसर मिलने पर महिला पंचायत जनप्रतिनिधि न केवल स्वयं निर्णय ले रही हैं, बल्कि विकास को नया आयाम भी दे रही है, लेकिन अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं है.
पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद उनके नेतृत्व क्षमता में विकास हुआ है. कई महिला पंचायत जनप्रतिनिधि अपने पंचायत में अच्छा काम कर रही है. अगर कहीं महिला पंचायत जनप्रतिनिधि के स्थान पर उनके रिश्तेदार काम को निपटाते हैं, तो गलत है. उनके रिश्तेदार को भी
चाहिए कि महिलाओं के नेतृत्व को आगे बढ़ायें. जिस उद्देश्य से आरक्षण व्यवस्था लागू की गयी, उस उद्देश्य को पूरा करने में पुरुष वर्ग को भी सहयोग करना चाहिए. प्रशासन को भी इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि महिला जन प्रतिनिधि अपने पंचायत व अन्य विकास के बात करें.
मिथिलेश मिश्र, जिला पदाधिकारी
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