प्रभात पड़ताल पहली कस्ति-निजी वद्यिालय की मनमानी से अभिभावक परेशान

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प्रभात पड़ताल पहली किस्त-निजी विद्यालय की मनमानी से अभिभावक परेशानपाठ्यपुस्तक, ड्रेस आदि के नाम पर होती है मनमानी वसूलीसूरज गुप्ता, कटिहारजिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी व निजी स्कूलों में नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गयी है. जिले में निजी विद्यालयों में नामांकन को लेकर अपनायी जा रही प्रक्रिया से अभिभावक परेशान हैं. समान […]

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प्रभात पड़ताल पहली किस्त-निजी विद्यालय की मनमानी से अभिभावक परेशानपाठ्यपुस्तक, ड्रेस आदि के नाम पर होती है मनमानी वसूलीसूरज गुप्ता, कटिहारजिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी व निजी स्कूलों में नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गयी है. जिले में निजी विद्यालयों में नामांकन को लेकर अपनायी जा रही प्रक्रिया से अभिभावक परेशान हैं. समान शिक्षा की उम्मीद पाले लोगों को निजी विद्यालय की मनमानी से चकित होना पड़ रहा है. जिस तरह नामांकन में अभिभावकों का आर्थिक दोहन किया जा रहा है, उससे साफ प्रतीत होता है कि सरकारी व्यवस्था का कोई नियंत्रण अब निजी विद्यालयों पर नहीं रहा. बेहतर शिक्षा दिलाने को लेकर अभिभावक भी मजबूरी में खामोश हैं. दूसरी तरफ अभिभावकों की खामोशी व सरकार की उदासीनता से निजी विद्यालयों की चांदी कट रही है. स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि निजी विद्यालय प्रबंधन शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ पुस्तक, लेखन सामग्री, पोशाक, जूता, टाई आदि की भी बिक्री मनमाने कीमत पर करने लगे हैं. नर्सरी में पढ़ने वाले बच्चों का बैग देखने से साफ नजर आ जाता है कि किस तरह निजी विद्यालय मनमाने तरीके से बच्चों को पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराते हैं. प्रभात खबर ने इन दिनों निजी विद्यालयों में चल रहे नये नामांकन, री-एडमिशन सहित विभिन्न माध्यमों से अभिभावकों के आर्थिक दोहन की नजदीक से पड़ताल की है. प्रस्तुत है निजी विद्यालय की मनमानी पर पड़ताल करती यह रिपोर्ट.नामांकन फीस में मनमानीजिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में 200 से अधिक निजी विद्यालय संचालित हो रहे हैं. स्थानीय शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में 227 निजी विद्यालय संचालित हो रहे हैं. शैक्षणिक सत्र 2016-2017 के लिए सरकारी और निजी विद्यालयों में नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. निजी विद्यालय प्रबंधन द्वारा नये नामांकन के नाम पर मनमानी फीस वसूली जा रही है. कई अभिभावक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें जमा की गयी पूरी राशि का बिल नहीं मिलता है. अभिभावकों की माने तो नर्सरी में नामांकन कराने में निजी विद्यालयों की अलग-अलग फीस निर्धारित है. मसलन नर्सरी कक्षा में नामांकन के लिए 1400-2500 रुपये तक लिये जा रहे हैं. इसी तरह अन्य दूसरी कक्षाओं के लिए भी राशि ली जाती है.विकास शुल्क के नाम पर अभिभावकों का शोषणनिजी विद्यालय द्वारा फीस संरचना भी अजीबोगरीब है. खासकर विकास शुल्क के नाम पर अभिभावकों का आर्थिक दोहन किया जाता है. विकास शुल्क की राशि का खर्च किस-किस मद में होता है. इसका कोई जिक्र नहीं होता और न ही इसकी जानकारी किसी अभिभावक को दी जाती है. दूसरी कई तरह की फीस भी ली जाती है. इससे अभिभावक आर्थिक दोहन के शिकार होते हैं. ऐसी फीस पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं है. विद्यालय बने पुस्तक बिक्री केंद्रअब निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे अपने पाठ्यक्रम के आधार पर बाजार से पुस्तक नहीं खरीद पाते हैं. पुस्तक के साथ-साथ लेखन सामग्री व ड्रेस खरीदने पर भी विद्यालय प्रबंधन द्वारा मनाही है. दरअसल पिछले दो-तीन वर्षों से निजी विद्यालय की मनमानी का ही नतीजा है कि अब बच्चों को अपने विद्यालय प्रबंधन को ऊंची कीमत देकर पुस्तक, लेखन सामग्री, ड्रेस आदि खरीदनी पड़ रही है. अधिकांश निजी विद्यालय अपने परिसर में पुस्तक व लेखन सामग्री की व्यवस्था दुकान के तरह कर लिये हैं. नर्सरी के बच्चों को 1400-2000 रुपये तक की पाठ्य पुस्तक व कॉपी उपलब्ध करायी जा रही है. जिस तरह कक्षा बढ़ती है उसी तरह पाठ्य पुस्तक की कीमतों में भी इजाफा होने लगता है. यानी एलकेजी के लिए 1500-2200 रुपये, यूकेजी के लिए 1500-2500 रुपये, स्टैंडर वन के लिए 2000-3000 रुपये की पाठ्य पुस्तक व कॉपी लेनी पड़ रही है. जबकि ड्रेस, टाई, एडमिशन आदि अलग-अलग कई तरह की फीस भी नामांकन के समय देना पड़ रही है.विभाग उदासीनकल्याणकारी राज्य में निजी विद्यालयों की इस तरह की मनमानी पर किसी तरह का सरकारी नियंत्रण नहीं होना मौजूदा व्यवस्था को मुंह चिढ़ाता है. स्थानीय शिक्षा विभाग भी इस मामले में पूरी तरह मौन है. स्थानीय शिक्षा विभाग न तो निजी विद्यालयों का निरीक्षण कर ऐसे मनमाने फीस नहीं लेने को लेकर कोई पहल कर रहा है और न ही सरकार इस दिशा में कोई ठोस पहल कर रही है. जबकि बिहार राज्य बाल अधिकार संगठन आयोग सहित कई सरकारी व गैरसरकारी एजेंसियां बाल संरक्षण जैसे मुद्दे को लेकर काम कर रही हैं. ऐसी व्यवस्था से किस तरह बच्चों को गरीब व मजदूर वर्ग के लोग बेहतर शिक्षा दिला सकेंगे. यह चिंता का विषय है.

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