मजदूर से पीरो के गांधी कहलाने वाले राम एकबाल वरसी
Author Prabhat khabar digital desk
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समाजवादी नेता राम एकबाल वरसी को अपनी मिट्टी से इतना प्यार था कि उन्होंने अपने नाम के आगे जातिसूचक उपाधि की जगह अपने गांव का नाम वरसी जोड़ लिया. परिवार की गरीबी के कारण वे छोटी उम्र में ही डालमियानगर कारखाने में मजदूर के रूप में भर्ती हो गये. मगर, नौकरी उन्हें रास नहीं आयी. […]
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समाजवादी नेता राम एकबाल वरसी को अपनी मिट्टी से इतना प्यार था कि उन्होंने अपने नाम के आगे जातिसूचक उपाधि की जगह अपने गांव का नाम वरसी जोड़ लिया.
परिवार की गरीबी के कारण वे छोटी उम्र में ही डालमियानगर कारखाने में मजदूर के रूप में भर्ती हो गये. मगर, नौकरी उन्हें रास नहीं आयी. 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में सोशलिस्ट नेता बसावन सिंह के नेतृत्व में शामिल हो गये. वरसी को कभी पद और सत्ता का मोह नहीं रहा.
वे संगठन में सैद्धांतिक गिरावट और नीतिगत भटकाव आने पर उसे तुरत छोड़ कर अपने सहयोगियों के साथ कई बार नये संगठन को उन्होंने खड़ा किया. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी जैसी बड़ी पार्टी में नीतिगत भटकाव आने पर जब डॉ लोहिया ने 1955-56 के दौर में नयी पार्टी सोशलिस्ट पार्टी बनायी, तो वे बिहार में वे एक बड़े समूह के साथ निर्मित सोशलिस्ट पार्टी में शमिल हो गये.
डॉ लोहिया की मौत के बाद संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी नेतृत्व के दिशाहीन व नीतिहीन होने पर समाजवादी विचारक किशन पटनायक के साथ मिल कर लोहिया विचार मंच की स्थापना करके संसोपा के शुद्धीकरण का प्रयास किया.
1974 के बिहार आंदोलन को गतिशील व व्यापक बनाने के लिए बिहार में लोहिया विचार मंच ने सक्रिय भूमिका निभायी. वरसी आपातकाल के दौरान गिरफ्तार होकर लंबे दिनों तक जेल में रहे. बिहार आंदोलन के गर्भ से निकली जनता पार्टी की सरकार भी जब वादाखिलाफी करने लगी तो उसे छोड़ने में वरसी और किशन पटनायक ने देर नहीं की.
प्रस्तुति : शिवपूजन सिंह, पूर्व विधायक
हर-जोर जुल्म के खिलाफ रहे वरसी
पुलिस-प्रशासन और सामंतों के खिलाफ अहिंसक लड़ाई लड़ कर वरसी ने अनगिनत बार जेल गये. पुलिस की भारी पिटाई के शिकार हुए. नासरीगंज के पवनी गांव में वहां के जालिम सामंतों ने इन्हें और इनके सहयोगी लक्ष्मण चौधरी के साथ आग में जला मारने का भी प्रयास किया था.
पुराने नोखा के जालिम सामंतों के सितम से आम जन त्रस्त थे. इसका विरोध करने वाले कई राजनीतिज्ञ कार्यकर्ताओं की हत्याएं इन कुख्यातों ने कर दी थीं. वरसी की पहल पर इन कुख्यातों के खिलफ संघर्ष मिटाने के लिए जुल्म मिटाओ समिति का गठन हुआ. डॉ लोहिया उन्हें उन्हें पीरो का गांधी कहा करते थे.
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