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मनरेगा योजना में काम नहीं मिलने से पलायन को मजबूर पहाड़ी गांवों के मजदूर

Updated at : 13 Sep 2019 7:37 AM (IST)
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मनरेगा योजना में काम नहीं मिलने से पलायन को मजबूर पहाड़ी गांवों के मजदूर

भभुआ : कैमूर के पहाड़ी गांवों से रोजगार की तलाश में पलायन करने के लिये मजबूर हैं ग्रामीण. मनरेगा योजना में जेसीबी मशीन से काम कराने के कारण ग्रामीणों को रोजगार नहीं मिल रहा है. गांव की योजनाओं की मापी पुस्तिका, स्थल पर जाने के बजाये प्रखंड मुख्यालय में ही बैठ कर तैयार कर ली […]

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भभुआ : कैमूर के पहाड़ी गांवों से रोजगार की तलाश में पलायन करने के लिये मजबूर हैं ग्रामीण. मनरेगा योजना में जेसीबी मशीन से काम कराने के कारण ग्रामीणों को रोजगार नहीं मिल रहा है.

गांव की योजनाओं की मापी पुस्तिका, स्थल पर जाने के बजाये प्रखंड मुख्यालय में ही बैठ कर तैयार कर ली जाती है. जिला कृषि पदाधिकारी द्वारा जिला प्रशासन को प्रस्तुत पलायन के कारणों को मनरेगा योजना की निरीक्षण रिपोर्ट ने पलायन के कारणों का एक नया आईना दिखा दिया है..
गौरतलब है कि कृषि प्रधान कैमूर जिले में मौसमी रोजगार के बाद ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिये सरकार ने मनरेगा योजना संचालित की थी.
हालांकि अभी भी मनरेगा योजना का लाभ ग्रामीणों तक शत प्रतिशत नहीं मिल रहा है. जिसके कारण रोजगार के तलाश में पहाड़ी क्षेत्र के मजदूर पलायन को मजबूर हैं. पिछले सप्ताह जिलापदाधिकारी के आदेश पर भूमि सुधार उप समाहर्ता मोहनिया ने अधौरा प्रखंड के बड़वान कला पंचायत में की गयी विभिन्न योजनाओं के निरीक्षण के बाद मनरेगा योजना का लाभ नहीं मिलने का मामला सामने आया है.
झुठला रही निरीक्षण रिपोर्ट : अभी हाल में ही जिला प्रशासन ने कैमूर से मजदूरों के पलायन के कारण की रिपोर्ट जिला कृषि पदाधिकारी से मांगी थी. जानकारी के अनुसार डीएओ द्वारा जिला प्रशासन को भेजी रिपोर्ट में मजदूरों के पलायन का कारण जिले में अद्यौगिक इकाईयों का कम होना, कृषि के समय मौसमी रोजगार ही उपलब्ध होना तथा कृषि क्षेत्र में अद्यौगिक इकाईयों के अपेक्षा कम मजदूरी मिलने के कारण गिनाये गये थे. लेकिन, जांच पदाधिकारी के निरीक्षण में यह स्पष्ट हो रहा है कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में जॉबकार्ड धारियों को काम नहीं मिलना भी मजदूरों के पलायन का एक बड़ा कारण बना है.
मुख्यालय में बैठ बन जाती है मापी पुस्तिका
योजनाओं की मापी पुस्तिका स्थल के बजाये प्रखंड मुख्यालय अधौरा में ही बैठ कर तैयार कर ली जाती है. पंचायत के वार्ड नंबर तीन में गली-नली योजना की जांच में पहुंचे पदाधिकारी को ग्रामीणों ने बताया कि योजना आरंभ होने से लेकर अंत तक किसी तकनीकी पदाधिकारी द्वारा योजना का जांच नहीं किया गया है. यहां तक प्रखंड के कनीय अभियंता भी कभी गांव में नहीं आये हैं. स्थल पर मापी किये बिना गली-नली योजना का अधौरा में बैठकर मापी कार्य पूरा किया है.
जेसीबी से कराया जा रहा है काम
मजदूरों ने जेसीबी से काम कराने की शिकायत जिला प्रशासन से की है. लेकिन, जिले के अति पिछड़े प्रखंड अधौरा वनवासियों से जुड़ा होने के कारण यह प्रशासन के लिये एक चुनौती बन सकता है. क्योंकि दुरूह पहाड़ी जंगलों के बीच बसे इन गांवों तक सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारना पहले से भी प्रशासन के लिये चुनौती रहा है. जबकि उक्त गांव में 300 से ऊपर जॉब कार्डधारियों की संख्या है.
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