खरना आज, शाम 6:45 से 9:55 बजे तक शुभ मुहूर्त
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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छठ पर्व को लेकर शहर सहित पूरे जिले में बहने लगी भक्ति की बयार भभुआ सदर : सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा मंगलवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गयी. पहले दिन नहाय-खाय के मौके पर व्रतियों ने मंगलवार को स्नान ध्यान कर पूजन किया, इसके बाद पवित्रता से सेंधा नमक के साथ शुद्ध […]
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छठ पर्व को लेकर शहर सहित पूरे जिले में बहने लगी भक्ति की बयार
भभुआ सदर : सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा मंगलवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गयी. पहले दिन नहाय-खाय के मौके पर व्रतियों ने मंगलवार को स्नान ध्यान कर पूजन किया,
इसके बाद पवित्रता से सेंधा नमक के साथ शुद्ध शाकाहारी कद्दू, चने की दाल, अरवा चावल आदि से बना प्रसाद स्वयं व अपने परिजनों, स्नेहजनों के साथ ग्रहण किया. बुधवार को खरना होगा. गौरतलब है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से महापर्व छठ की शुरुआत हो जाती है. इस बार यह पर्व मंगलवार, 24 अक्तूबर से शुरू होकर शुक्रवार 27 अक्तूबर तक बहुत ही सात्विकता के साथ मनाया जायेगा. इसमें व्रती अस्ताचलगामी (प्रथम अर्ध) और उदीयमान सूर्यदेव (दूसरा अर्ध) को अर्ध अर्पित कर भगवान से सुख- समृद्धि का आशीर्वाद मांगती है. व्रत का प्रथम संयम 24 अक्तूबर को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया. मंगलवार को छठव्रती प्रात: काल स्नानादि से निवृत्त होकर अरवा चावल, चने की दाल, लौकी से विभिन्न व्यंजन तैयार किया. तदोपरांत छठव्रती भोजन का एक छोटा हिस्सा सूर्य को समर्पित कर खुद उस भोजन को ग्रहण किया. बाद में परिवार के सदस्य उसी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर छठ माता से आशीर्वाद मांगा.
प्रदोष काल में खरना का पूजन सर्वोत्तम : व्रत का द्वितीय संयम खरना बुधवार 25 अक्तूबर यानी आज है. डाकेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी व विद्वान कामेश्वर तिवारी ने बताया कि शाम 06:45 बजे से रात 09:55 बजे तक खरना का शुभ मुहूर्त है.
खरना में व्रती प्रात: काल में ही स्नानादि से निवृत्त हो जाते हैं. दोपहर के बाद फिर से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर घर के नियत कक्ष में आम की लकड़ी से गुड़, अरवा चावल, गाय दूध, गाय की घी आदि से खीर बनाती है. शुद्ध आटे की रोटी भी बनायी जाती है. कुल परंपरा के अनुसार विभिन्न प्रकार के सात्विक व्यंजन तैयार किये जाते हैं. शुभ मुहूर्त में शांतभाव से एकाग्र होकर छठी मैया और आराध्य देव की पूजा की जाती है. इस प्रसाद को सबसे पहले व्रती ग्रहण करती हैं. इसके बाद इसे परिजन और मित्रजनों में बांटा जाता है. खरना में प्रदोष काल पूजन को सर्वोत्तम माना गया हैं.
शाम 4:30 से 5:10 बजे तक प्रथम अर्ध का सर्वोत्तम समय: गुरुवार 26 अक्तूबर को अस्तचलगामी सूर्यदेव को अर्ध दान (प्रथम अर्ध) दिया जायेगा. इसे डाला छठ भी कहा जाता है. इस दिन व्रती ब्रह्म मुहूर्त से पहले नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूजा के निमित्त विभिन्न प्रकार के नेवैद्य तैयार करती हैं.
गेहूं आटा, गुड़, गाय घी आदि सहित चावल आटा, तिल, गुड़ से लड्डू व अन्य से पकवान बनाया जाता है. इसे सूप में सजाया जाता है, जिसे डलिया में रख कर नदी, तालाब अथवा जलाशय तट पर ले जाया जाता है. वहां अस्तचलगामी सूर्यदेव को अर्ध अर्पित किया जाता है. पुजारी कामेश्वर तिवारी ने बताया कि गुरुवार की शाम 04:30 से 05:10 बजे तक प्रथम अर्ध का सर्वोत्तम समय है.
द्वितीय अर्ध का सर्वोत्तम समय सुबह 5:49 से 7:15 बजे तक: शुक्रवार 27 अक्तूबर को उदीयमान सूर्यदेव का अर्घ्य अर्पित किया जायेगा. इस दिन व्रती पारना करेंगी. व्रती और श्रद्धालु ब्रह्म मुहूर्त से पहले स्नानादि से निवृत्त होकर श्रद्धा के साथ डालिया सजा कर छठ घाट ले जाते हैं.
घाट पर छठ गीत गाते हुए सूर्यदेव के उदय होने का इंतजार किया जाता है. उदित होने के साथ अर्ध अर्पण शुरू हो जाता है. व्रती सुबह 05:50 से 08:50 बजे तक पारन जरूर तक लें. को शुक्रवार द्वितीय अर्ध का सर्वोत्तम समय प्रात: 05:49 बजे से 07:15 बजे तक है
भक्ति ऐसी कि कोई तामझाम की जरूरत नहीं: भक्ति और अध्यात्म से भरपूर इस पर्व के लिए न बड़े पंडालों की जरूरत होती है और न ही बड़े-बड़े मंदिरों की. इसके लिए न ही चमक-दमक वाली मूर्तियों की जरूरत होती है.
यह पर्व बांस से बनी टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गुड़, चावल और गेहूं से बना प्रसाद और कानों में शहद घोलते लोकगीतों के साथ जीवन में भरपूर मिठास घोलता है. ये व्रत अत्यंत सफाई और सात्विकता का प्रतीक है. इसमें आवश्यक रूप से सफाई का ख्याल रखना चाहिए. घर में अगर एक भी व्यक्ति ने छठ का उपवास रखा है तो बाकी सभी को भी सात्विकता और स्वच्छता का पालन करना पड़ता है.
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