किसान खुश, बिचड़े डालने में जुटे

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सन 1957 में हुई थी नहर की खुदाई कुदरा, मोहनिया व दुर्गावती की 19 हजार हेक्टेयर भूमि को मिलता है पानी मोहनिया सदर : मोहनिया अनुमंडल के तीन प्रखंडों के किसानों के लिए लाइफलाइन मानी जानेवाली दुर्गावती मुख्य नहर में जानकारों की माने तो खुदाई के 59 वर्ष बाद चालू वर्ष का 20 जून पहला […]

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सन 1957 में हुई थी नहर की खुदाई
कुदरा, मोहनिया व दुर्गावती की 19 हजार हेक्टेयर भूमि को मिलता है पानी
मोहनिया सदर : मोहनिया अनुमंडल के तीन प्रखंडों के किसानों के लिए लाइफलाइन मानी जानेवाली दुर्गावती मुख्य नहर में जानकारों की माने तो खुदाई के 59 वर्ष बाद चालू वर्ष का 20 जून पहला ऐसा ऐतिहासिक दिन रहा है, जब इस नहर में पर्याप्त मात्रा में पानी छोड़ा गया. रोहिणी के समय यानी 25 मई से लेकर 18 जून तक इस क्षेत्र के महज 10 फीसदी संपन्न किसान ही धान के बिचड़े डाल सके थे. लेकिन, 20 जून को नहर में पानी आने के बाद तो सभी किसान अपने खेतों में बिचड़े डालनें में जुट गये. इसी तरह पानी मिलता रहा तो 15 से 20 दिनों में धान की रोपनी भी किसान शुरु कर देंगे.
सन 1956 की बाढ़ त्रासदी ने दिया नहर को जन्म
बघिनी गांव के कुछ जानकार किसान बताते है कि सन 1956 में आयी भीषण बाढ़ ने इस क्षेत्र को बाढ़ व सूखा से बचाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर इस नहर के निर्माण की कवायद तेज हुई. किसी तरह बाढ़ की भयावह त्रासदी झेलने के बाद 1957 में इस दुर्गावती मुख्य नहर की खुदाई शुरू हुई. जिस रूट से नहर को निकलना था उन खेतों में लगी गेहूं, चना व दलहन को लोगों ने तैयार होने से पहले ही उखाड़ कर पशुओं को खिला दिया था. ताकि, नहर निर्माण में फसल बाधक न बन सके. उस समय इस नहर को कुदरा के सकरी के समीप रोहतास से गुजरनेवाली सोन नहर से जोड़ा गया था. सोन नहर का पानी इस मुख्य नहर को मिलता था, जिससे मोहनिया अनुमंडल के तीन प्रखंडों कुदरा, मोहनिया व दुर्गावती के 19 हजार हेक्टेयर सिंचित भूमि को पानी मिलता था.
1966 के अकाल में भी नहीं छोड़ा था साथ
वयोवृद्ध किसान मोहन गुप्ता की मानें तो सन 1956 की भयावह बाढ़ त्रासदी के एक दशक बाद सन 1966 के भीषण अकाल में भी इस नहर ने किसानों का साथ नहीं छोड़ा और कमोवेश पानी इस क्षेत्र के कसानों को जरूर मिला था. लेकिन, इस नहर को वर्ष 2014 में दुर्गावती जलाशय परियोजना से जोड़ दिया गया. दुर्गावती जलाशय का उद‍्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने 15 अक्तूबर 2014 को किया था. वर्ष 2015 में पड़े सूखें ने तो सन 1966 के अकाल को भी पीछे छोड़ दिया और धान का कटोरा के नाम से विख्यात कैमूर में धान की मुआर काटनी पड़ी. उस समय इस लाइफलाइन दुर्गावती मुख्य नहर ने भी किसानों का साथ पूरी तरह छोड़ दिया था.
इस नहर में इतना भी पानी नहीं छोड़ा जा सका था कि एक पक्षी भी अपनी प्यास बुझा सके. डैम से कैमूर की ओर निकलनेवाली 34 किमी लंबी नहर में 600 क्यूसेक पानी डिस्चार्ज की क्षमता है. वर्ष 2016 में इसी नहर की बदौलत इस क्षेत्र के किसान धन धान से परिपूर्ण हो गये थे. इस बार समय से नहर में पानी का आना धान की खेती के लिए शुभ संकेत माना जा रहा है.
क्या कहते हैं अधिकारी
इस संबंध में दुर्गावती बायां तट नहर प्रमंडल भीतरी बांध के कार्यपालक अभियंता सुशील कुमार ने बताया कि इस बार बीचड़ा डालने के लिए पानी छोड़ा गया है. बारिश अच्छी होती है तो खरीफ से लेकर रबी फसल की बुआई तक किसानों को इस नहर से पर्याप्त पानी मिलेगा.
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