नहीं रहे सिकंदरा के ‘सिकंदर’

Published by :PANKAJ KUMAR SINGH
Published at :29 Apr 2026 9:53 PM (IST)
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नहीं रहे सिकंदरा के ‘सिकंदर’

अंतिम दर्शन और राजकीय सम्मान के साथ होगा अंतिम संस्कार

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सात बार के विधायक और पूर्व मंत्री रामेश्वर पासवान का निधन, दिल का दौरा पड़ने से ली अंतिम सांस

1969 में पहली बार बने थे विधायक, दो बार संभाली मंत्री पद की जिम्मेदारी

सिकंदरा. सिकंदरा विधानसभा क्षेत्र के कद्दावर नेता, सात बार के विधायक और बिहार सरकार के पूर्व मंत्री रामेश्वर पासवान का बुधवार सुबह 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. उनके निधन से सिकंदरा समेत पूरे जमुई जिले में शोक की लहर है.

परिजनों के अनुसार, उनका पार्थिव शरीर पटना स्थित आवास पर रखा गया है. बुधवार को उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए विधानसभा परिसर ले जाया जाएगा. इसके बाद पार्थिव शरीर को सिकंदरा स्थित आवास लाया जाएगा और अंततः पैतृक गांव नौआडीह में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

सात बार विधायक, क्षेत्र में थी मजबूत पकड़

सिकंदरा के सिकंदर कहे जाने वाले रामेश्वर पासवान सिकंदरा विधानसभा क्षेत्र से सात बार विधायक चुने गये. वे जनाधार वाले नेता थे और गरीबों, दलितों व वंचितों की आवाज के रूप में उनकी पहचान थी. उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में दरोगा प्रसाद राय और नीतीश कुमार के कार्यकाल में पथ निर्माण विभाग और समाज कल्याण मंत्री के रूप में अहम जिम्मेदारियां निभायीं.

राजनीतिक सफर : संघर्ष, उतार-चढ़ाव और दमदार वापसी

प्रखंड क्षेत्र के नौआडीह गांव निवासी रामेश्वर पासवान ने अपने जीवन की शुरुआत एक साधारण नौकरी से की थी. उन्हें पश्चिम बंगाल के श्रीपुर कोयला खदान में क्लर्क की नौकरी मिली थी. इसी दौरान वर्ष 1967 के परिसीमन में सिकंदरा विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गयी, जिसने उनके राजनीतिक जीवन की दिशा बदल दी. 1952 से लगातार इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा था, लेकिन 1967 के चुनाव में पहली बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार स्वामी विवेकानंद ने जीत दर्ज की. इसके बाद स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व ने एक शिक्षित दलित चेहरे की तलाश शुरू की. तत्कालीन कांग्रेस नेता रामकिशुन शर्मा की अनुशंसा पर पार्टी ने 1969 में रामेश्वर पासवान को उम्मीदवार बनाया. उन्होंने अपने पहले ही चुनाव में जीत हासिल कर राजनीति में मजबूत एंट्री की. चुनाव के बाद दरोगा प्रसाद राय के नेतृत्व में बनी सरकार में उन्हें पथ निर्माण विभाग का मंत्री बनाया गया. 1972 में उन्होंने लगातार दूसरी बार कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की, लेकिन 1977 में जेपी आंदोलन के प्रभाव में हुए चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद हुए मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया. इसके बावजूद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और ‘सीढ़ी’ चुनाव चिह्न के सहारे जीत हासिल कर अपनी लोकप्रियता साबित की. इसके बाद में वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गये और 1985 में चौथी बार विधायक बने. हालांकि 1990, 1995 और 2000 के विधानसभा चुनावों में उन्हें लगातार तीन बार प्रयाग चौधरी से हार झेलनी पड़ी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 2005 के फरवरी चुनाव में उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए प्रयाग चौधरी को हराकर शानदार वापसी की. हालांकि उस समय किसी दल को बहुमत नहीं मिलने के कारण विधानसभा भंग कर दी गयी थी.

नवंबर 2005 में हुए पुनः चुनाव में रामेश्वर पासवान ने जनता दल (यूनाइटेड) के टिकट पर जीत दर्ज कर छठी बार विधानसभा में प्रवेश किया. इसके बाद 2010 में वे सातवीं बार विधायक बने. 2015 के विधानसभा चुनाव में भी वे जदयू से टिकट के प्रबल दावेदार थे, लेकिन जदयू-राजद-कांग्रेस गठबंधन में सिकंदरा सीट कांग्रेस के खाते में चली गयी, जिससे उन्हें टिकट नहीं मिल सका और उनका सक्रिय चुनावी सफर यहीं थम गया.

किस्मत ने फिर दिलाया मंत्री पद

वर्ष 2005 के नवंबर माह में हुए विधानसभा चुनाव के बाद जदयू-भाजपा गठबंधन की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी. इस सरकार के गठन के दौरान शपथ ग्रहण समारोह में जीतन राम मांझी को भी मंत्री पद की शपथ दिलायी गयी थी. हालांकि, डिग्री घोटाले में संलिप्तता के आरोप सामने आने पर उन्हें शपथ के दूसरे ही दिन मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद दलित नेतृत्व के अनुभवी चेहरे के रूप में रामेश्वर पासवान को मंत्री पद की शपथ दिला कर उन्हें समाज कल्याण विभाग की अहम जिम्मेदारी सौंपी गयी.

सामाजिक व राजनीतिक जगत में शोक

रामेश्वर पासवान के निधन पर विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है. लोगों का कहना है कि उनके निधन से क्षेत्र ने एक अनुभवी, सरल और जनहितैषी नेता खो दिया है. उनका पूरा जीवन संघर्ष, जनसेवा और सादगी का उदाहरण रहा. सिकंदरा की राजनीति में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा

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