दाल की चाल पर नयी फसल का ब्रेक

Published at :20 Dec 2016 8:02 AM (IST)
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दाल की चाल पर नयी फसल का ब्रेक

पूंजी टूटने के डर से बेच रहे महंगी दाल अरहर का तो समर्थन मूल्य से भी नीचे गोपालगंज : रिकाॅर्ड तेजी के कारण लगातार दो साल तक सुर्खियों में रहने के बाद हाल के दिनों में अरहर और इसकी दाल के भाव तेजी से गिरे हैं. थोक बाजार में हफ्ते भर पहले इसके भाव 10000 […]

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पूंजी टूटने के डर से बेच रहे महंगी दाल
अरहर का तो समर्थन मूल्य से भी नीचे
गोपालगंज : रिकाॅर्ड तेजी के कारण लगातार दो साल तक सुर्खियों में रहने के बाद हाल के दिनों में अरहर और इसकी दाल के भाव तेजी से गिरे हैं. थोक बाजार में हफ्ते भर पहले इसके भाव 10000 से 10500 रुपये प्रति क्विंटल थे.
मौजूदा समय में ये टूट कर 8500-8600 रुपये तक आ गये हैं. हालांकि फुटकर में ग्राहकों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है. वजह यह था कि महंगी दाल लेकर थोक व्यापारी अब भी फंसे हुए हैं. पूंजी टूटने के डर से अब भी छोटे व्यापारियों को वे ऊंचे भाव पर माल दे रहे हैं.
महाराष्ट्र और कर्नाटक में बंपर फसल : किराने के थोक और फुटकर कारोबारी संदीप के मुताबिक इस समय कर्नाटक और महाराष्ट्र की मंडियों में अरहर की नयी फसल आ चुकी है. अरहर दाल की तेजी के नाते केंद्र और प्रदेश सरकारें लगातार परेशान थीं. यही वजह है कि केंद्र ने अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा कर प्रति क्विंटल 5050 रुपये कर दिया था. कुछ सरकारों ने इस पर अलग से प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की थी. इस सबके नाते खरीफ के सीजन में किसानों ने दलहन फसलों का रकबा बढ़ा दिया. इसमें सर्वाधिक 51 फीसदी बढ़ा रकबा अरहर का ही था.
संयोग से फसल भी अच्छी हुई. तैयार होने के बाद उत्पादक क्षेत्र की मंडियों में फसल आने के बाद से अरहर और उसकी दाल के भाव टूटे हैं. अरहर का तो समर्थन मूल्य से भी नीचे चला गया है. जानकारों की मानें, तो अगले दो हफ्तों में आवश्यक चरम पर होगी, तब भाव और घटेंगे. इसकी दूसरी वजह सरकार द्वारा बड़ा मात्रा में आयातित दाल की उपलब्धता भी है.
चना अब भी सौ के पार : चने की तेजी जस-की-तस है. थोक और फुटकर में अब भी चना सौ रुपये प्रति किग्रा के ऊपर है. मौजूदा समय में गुणवत्ता के अनुसार थोक में चना 108 से 110 रुपये किग्रा के भाव है. फुटकर भाव 120 रुपये के करीब है. इसी तरह थोक में चना दाल के भाव 125-127 रुपये है. बेसन के भाव 150 या उसके पार है. चना रबी की फसल है. इसकी मांग भी ठीकठाक रहती है. नयी फसल मार्च-अप्रैल में आती है. लिहाजा इसमें मंदी की संभावना कम है.
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