अब किसी और फुलमति को नहीं धोना पड़ेगा दूसरे का बरतन
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :03 Apr 2016 3:50 AM (IST)
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शराबबंदी से हथुआ के आधा दर्जन परिवारों में खुशी शराबबंदी से हथुआ में खुशी की लहर है. हंसते-खेलते एक परिवार को शराब ने तबाह कर दिया था. कई का सुहाग उजड़ गया, तो किसी के सिर से पिता का साया हट गया. प्रभात खबर की टीम ने सिंगहा गांव के तीन परिवारों के हालात पर […]
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शराबबंदी से हथुआ के आधा दर्जन परिवारों में खुशी
शराबबंदी से हथुआ में खुशी की लहर है. हंसते-खेलते एक परिवार को शराब ने तबाह कर दिया था. कई का सुहाग उजड़ गया, तो किसी के सिर से पिता का साया हट गया. प्रभात खबर की टीम ने सिंगहा गांव के तीन परिवारों के हालात पर रिपोर्ट तैयार की.
हथुआ : सिंगहा गांव के उत्क्रमित मध्य विद्यालय में बरतन साफ कर रही फुलमति देवी में शराबबंदी से खुशी देखी जा रही है. वह आंखों में आंसू लिये कहती है-अब किसी बहन को फुलमति देवी की तरह बरतन नहीं धोना पड़ेगा. 2010 में शराब ने पति सत्यदेव ठाकुर की जान ले ली़ पति हमेशा बीमार रहता था. डॉक्टर ने किडनी व लीवर खराब हो जाने के कारण जवाब दे दिया था.
पति के इलाज के लिए पैसों की जरूरत थी. इस स्थिति में फुलमति लोगों के घर बरतन माजती तथा खेतों में काम कर पांच बेटियों व दो बेटों का पेट भरती थी. जमीन बेच कर पति का इलाज कराया, लेकिन जान नहीं बची. आज वह उत्क्रमित मध्य विद्यालय में 1250 रुपये में प्रतिमाह सहायक रसोइये का काम करती है.
समय से पैसे भी नहीं मिलते हैं. इस कारण बचे समय में लोगों के घर काम कर अपने परिवार का जीवन व्यतीत कर रही है. एक वर्ष पूर्व दो बेटियों की शादी गांव वालों की मदद से की है़ वह कहती है कि पांच वर्ष पूर्व शराबबंदी हुई होती, तो आज मेरा परिवार खुशहाल होता.
हजरत व अलाउद्दीन के परिवार को भी शराब ने बिखेरा
जिनके घर की खुशियों को शराब ने बिखेर दिया. 45 वर्षीय हजरत अली की चिकेन की दुकान थी. अच्छी-खासी आमदनी होती थी. 2006 में शराब की लत लग गयी. वह इतना पीने लगा कि दुकान बंद हो गयी. 2009 में वह बीमार पड़ गया. उसकी पत्नी फतमा खातून खेत व गहने बेच कर इलाज कराने के लिए पटना और गोरखपुर गयी. लगभग तीन लाख रुपये खर्च हुए, लेकिन सात जनवरी, 2016 को उसकी मौत हो गयी. तीन पुत्र व तीन पुत्रियों का खर्च चलाना फतमा खातून को कठिन हो गया है.
दो बेिटयों की शादी की चिंता सता रही है. तीनों पुत्र मजदूरी कर परिवार का खर्च चला रहे हैं.
वहीं दूसरा परिवार अलाउद्दीन मियां का है, जिनकी साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी. तीन वर्ष से उनको भी शराब की लत लग गयी थी. जब वह बीमार पड़ गये तो भाइयों ने उन्हें अलग कर दिया.
आठ दिसंबर, 2015 को उनकी मौत हो गयी. दो पुत्र व तीन पुत्रियां हैं. बची जमीन इलाज कराने में बिक गयी. स्थिति यह है कि दो पुत्र बाल मजदूरी करते हैं, जबकि तीनों पुत्रियां लोगों के घर में काम करती हैं. सरकार की शराबबंदी के फैसले से तीनों परिवारों में खुशी है.
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