कुख्यात नाम रहा है बिंदी यादव

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 10 May 2016 9:33 AM

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गया: विगत शनिवार की रात गया शहर के एक छात्र आदित्य सचदेवा की हत्या के बाद मुख्य आरोपित रॉकी यादव के पिता बिंदी यादव एक बार फिर से चर्चा में हैं. पुलिस ने हत्या की घटना के तुरंत बाद की कार्रवाई में रॉकी के नहीं मिलने पर उसके पिता बिंदी यादव को ही घर से […]

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गया: विगत शनिवार की रात गया शहर के एक छात्र आदित्य सचदेवा की हत्या के बाद मुख्य आरोपित रॉकी यादव के पिता बिंदी यादव एक बार फिर से चर्चा में हैं. पुलिस ने हत्या की घटना के तुरंत बाद की कार्रवाई में रॉकी के नहीं मिलने पर उसके पिता बिंदी यादव को ही घर से उठा लायी. उन पर आरोप है हत्या के आरोपित रॉकी को संरक्षण देने और भागने में मदद का. सोमवार को यहां की एक अदालत में पेश कर पुलिस ने 14 दिनों के लिए बिंदी यादव को जेल हिरासत में भिजवा दिया है. बिंदी यादव की गिरफ्तारी के बाद से ही लोगों में इस नाम को लेकर फिर से जोरदार चर्चा जारी है. दरअसल, बिंदी यादव का इतिहास कई कुख्यात मामलों से भरा है. कभी तो यह नाम ही कुख्यात था. तब बिंदी यादव का नाम ही किसी को आतंकित करने के लिए काफी था.
जीटी रोड से चर्चा में आये थे बिंदी यादव : बिंदी यादव का घर-परिवार गणेश चक का रहनेवाला है. यह गांव जीटी रोड से सटे मोहनपुर इलाके में पड़ता है. देश के सबसे महत्वपूर्ण रोड में से एक जीटी रोड हमेशा ही मालवाही वाहनों की यात्रा के लिए सुरक्षित व सुगम माना जाता था. 1990 के दशक में इस रोड की छवि ऐसी ही थी. पर, इसी दौरान मोहनपुर के समीप बाराचट्टी के आसपास जीटी रोड पर तरह-तरह की आपराधिक गतिविधियां रिपोर्ट होने लगीं. आये दिन लूटपाट और छिनतई की घटनाएं सुनाई पड़ने लगीं. कई बार तो पता चलता कि पूरी की पूरी गाड़ी ही गायब हो गयी. कहां गयी, कौन ले गया, यह रहस्य बन कर रह जाता. और तो और लक्जरी गाड़ियों की खेप भी गायब हो जाती थी. इस तरह की घटनाओं से एक ऐसा माहौल बना कि आम आदमी तो दूर, पुलिस व प्रशासन के लोग भी बाराचट्टी, मोहनपुर व जीटी रोड के नाम सुनते ही खौफ खाने लगे. इसी बीच बिंदी-बच्चू-टीपू-टार्जन जैसे नाम एक साथ सुनाई पड़ने लगे. पुलिस अपने हिसाब से इनके खिलाफ कार्रवाई की बात करती, पर इससे जमीनी स्तर पर कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा. ऊपरोक्त नाम अपनी करतूतों के चलते लगातार कुख्यात होते गये और ये धीरे-धीरे शोले के गब्बर की छवि पा गये. हालांकि, ऊपरोक्त चार में से दो नाम अब इतिहास के पन्नों में ही हैं. क्योंकि, टीपू-टार्जन अब दुनिया में ही नहीं रहे. आपसी आपराधिक संघर्ष में दोनों स्वर्ग सिधार गये.
एंट्री माफिया के तौर पर भी हुए कुख्यात: बिंदी यादव व उनके सहयोगियों के सभी आपराधिक क्रिया-कलाप जीटी रोड पर बाराचट्टी (सूर्यमंडल चेकपोस्ट) आसपास जारी थे. इसी दौरान इनकी आंखें बिहार-झारखंड-बंगाल व यूपी के बीच दौड़ती मालवाही गाड़ियों के हिसाब-किताब पर पड़ी. बुद्धि ने इन्हें नया रास्ता दिखाया, तो बिना पैसे चुकाये व बगैर कागज-परमिट के ही गाड़ियां पार कराने का नया धंधा भी शुरू हो गया. यह धंधा लंबे समय तक चलता रहा. अबाध रूप से. सूत्रों का कहना है कि सीधे तो नहीं, पर दूसरे सहयोगियों की मदद से अब भी बिंदी का इस धंधे में बोलबाला है.
जैन अपहरण कांड में हुई बिंदी की भी चर्चा: गया शहर के एक बड़े कपड़ा व्यवसायी जय कुमार जैन के अपहरण के मामले में बिंदी यादव का नाम खूब चर्चा में रहा. सर्किट हाउस के सामने स्थित मकान के पास ही मॉर्निंग वाक के समय उन्हें उठा लिया गया था. कई दिन गायब रहने के बाद वापस लौटे. किस आधार पर उन्हें मुक्ति मिली, इस पर औपचारिक तौर पर किसी ने कभी कुछ नहीं कहा, पर लोगों के बीच फिरौती के लेनदेन के बाबत लाखों-करोड़ों की बातें होती रहीं.
जमीन हड़पने के मामले भी रहे चर्चा में: जानकारी के मुताबिक, बिंदी यादव के पास काफी जमीन है. पर, जमीन हड़पने के मामले भी काफी हैं. सूत्रों की मानें, तो नाम के खौफ का इस्तेमाल कर बिंदी यादव व उनके दूसरे सहयोगियों ने कमजोर व दब्बू किस्म के लोगों के नाम अच्छी जगहों पर स्थित भूखंडों को औने-पौने अपने नाम करा लिया. इससे जमीन भी इनकी होती गयी और मामले भी इनके खिलाफ सामने नहीं आ सके. क्योंकि, कागजी तौर पर लिखाई-पढ़ाई की खानापूर्ति भी हो जाती थी. इतना ही नहीं, चूंकि बिंदी यादव एक बड़ा नाम हो चुका था, अगर किसी की कोई शिकायत थी भी, तो वह सामने आने से डर कर मुकर गया.
राजनीति में बिंदी ने जमाये पैर
जब अपराध की दुनिया में सक्रिय रहते हुए बिंदी यादव ने खूब पैसे बटोर लिये, तो इस कमाई का वह सदुपयोग करने के लिए बिजनेस और राजनीति में कदम बढ़ा दिये. कंस्ट्रक्शन कंपनी बना ली. होटल बना रहे हैं. पेट्रोल पंप खोल लिया. और इन सबके साथ ही सक्रिय राजनीति में भी कदम रख दिये.

पति-पत्नी दोनों. पत्नी मनोरमा देवी को 2001 के पहले पंचायत चुनाव में ही खड़ा करा दिया. वह जीत भी गयीं. तब आपराधिक छवि और राजनीतिक रसूख के बूते बिंदी ने पत्नी को मोहनपुर प्रखंड का प्रमुख बनवा लिया. इसी दौरान खुद भी जिला परिषद की सदस्यता के लिए लड़े और चुन भी लिये गये. अब बारी थी जिला परिषद का अध्यक्ष बनने की. वह भी बन लिये. उस दौर को याद करनेवाले बताते हैं कि बिंदी नाम ही काफी था. कोई बड़ा विरोध हो, ऐसा नहीं. सो बहुत आसान रहा बिंदी का शुरुआती राजनीतिक सफर. जब पत्नी मनोरमा प्रमुख थीं, तभी 2003 में विधान परिषद का चुनाव आ गया. पैसे तो थे ही. राजद का साथ भी मिल गया. टिकट मिला, तो मनोरमा मैदान में उतरीं और जैसी लोगों की उम्मीद थी, वह बाजी भी मार गयीं. अपने नाम नहीं छापने की शर्त पर एक समाजसेवी कहते हैं कि बिहार की राजनीति ही ऐसी रही है, जहां अपराधी ही लोकप्रियता के शिखर पर आसानी से चले जाते हैं. पैसे की भूमिका है सो अलग. मनोरमा अब विधान पार्षद बन चुकी थीं. उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया. अगले चुनाव में वह जरूर हार गयीं. जदयू के उम्मीदवार अनुज सिंह से. लेकिन, तब की हार का बदला एक बार फिर से मनोरमा ने ले लिया है. पिछले वर्ष हुए विधान परिषद चुनावों में मनोरमा को उसी जदयू ने टिकट दे दिया, जिसके उम्मेीदवार अनुज सिंह से वह 2009 में चुनाव हारी थीं. मनोरमा एक बार फिर से बिहार विधान परिषद पहुंच गयी हैं.

पेट्रोल पंप व कंस्ट्रक्शन कंपनी के भी हैं मालिक
1990 के दशक में बिंदी यादव का साम्राज्य लगातार बड़ा होता जा रहा था. कथित तौर पर अपराध की दुनिया से पैसे भी खूब आये, तो भविष्य का ध्यान रखते हुए पैसे को मैनेज करने की तरकीब भी लगायी. बिंदी यादव जीटी रोड पर ही एक पेट्रोल पंप के मालिक हो गये. बाद में राम्या कंस्ट्रक्शंस नामक एक कंपनी भी बना ली, जिसे बाद में राजनीतिक-प्रशासनिक आशीर्वाद से आगे चल कर सड़क आदि बनाने का ठेका-पट्टा भी मिलने लगा. इस तरह अब बिंदी यादव के पास पैसे की आय के सफेद स्रोत भी सामने दिखने लगे.
गया शहर में बन रहा होटल भी
अपराध की दुनिया से अलग जब बिजनेस पर बिंदी यादव का ध्यान केंद्रित होने लगा, तो गया स्टेशन से सटे स्टेशन रोड में एक होटल की भी नींव पड़ी. यह होटल फिलहाल निर्माणाधीन है. आदित्य हत्याकांड के मद्देनजर सोमवार को यहां गया बंद के दौरान इस होटल में कुछ उपद्रवी तत्वों ने तोड़फोड़ भी कर दी.
बिहार-झारखंड में दर्ज हैं कई मामले
बिंदी यादव की आपराधिक गतिविधियों के चलते कई बार उनके खिलाफ कानूनी पहल भी हुई. बिहार के औरंगाबाद जिले के मदनपुर, गया के बाराचट्टी, सिविल लाइंस, मगध विश्वविद्यालय व झारखंड के जमशेदपुर में इनके खिलाफ कई आपराधिक शिकायतें दर्ज हुईं. अब भी कई मामले लंबित बताये जा रहे हैं. अधिकतर मामले लूटपाट, अपहरण व आर्म्स एक्ट के तहत हुए.
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