Darbhanga News: पूर्ण जिम्मेदारी के साथ कार्य करें तो संस्कृत के प्रति सोच व माहौल में आयेगा बदलाव

Published by : PRABHAT KUMAR Updated At : 06 Aug 2025 10:32 PM

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Darbhanga News:बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने कहा कि संस्कृत है तो संस्कृति है, संस्कार है और तब ही राष्ट्र भी है.

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Darbhanga News: दरभंगा. बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने कहा कि संस्कृत है तो संस्कृति है, संस्कार है और तब ही राष्ट्र भी है. इसलिए इस देव भाषा के उत्थान व विकास का प्रयास जरूरी है. हम इसमें दिलोजान से लगे हुए हैं. वे कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के दरबार हॉल में आयोजित संस्कृत सप्ताह समारोह के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे. उन्होंने अंग्रेजी के तीन शब्द पॉजिटिव, नैरेटिव के साथ मैसिव पर जोर दिया. कहा कि सकारात्मक सोच के साथ शिक्षण संस्थानों का माहौल व परिवेश बदलें. समाज में प्रभावी भूमिका को बढ़ाते हुए संस्कृत की रक्षा करें. अगर पूर्ण जिम्मेदारी के साथ कार्य किया जाएगा, तो संस्कृत के प्रति सोच व माहौल में अवश्य बदलाव आएगा. कहा कि संस्कृत का अध्ययन व अध्यापन ईश्वरीय कार्य है. अब सभी स्कूलों में संस्कृत में ही प्रार्थना की अनिवार्यता कर दी गयी है.

मठ- मंदिरों में संस्कृत की होगी पढ़ाई

अध्यक्ष ने कहा कि वे गुरुकुल परम्परा के हिमायती रहे हैं. प्रदेश के पंजीकृत करीब 400-450 मठ- मंदिरों की कमेटी से सम्पर्क स्थापित कर वहां संस्कृत की पढ़ाई शुरू कराने की योजना पर काम कर रहे हैं. वहां भी बोर्ड के पाठ्क्रमों को ही संचालित किया जाएगा. बताया कि पटना के रविन्द्र भवन में 12 अगस्त को बोर्ड का अपना वेबसाइट लांच किया जाएगा. मौके पर प्रदेश से 648 प्रधानाचार्यों को बुलाया गया है.

45 विद्यालयों को बनाया जाएगा आधुनिक

कहा कि साथ ही 45 विद्यालयों को आधुनिक बनाया जाएगा. एआइ की दौर में सभी कार्यक्रमों व विशेष गतिविधियों को पोर्टल पर अपलोड करने की सलाह दी. अध्यक्ष ने कहा कि बोर्ड एवं विश्वविद्यालय को समन्वय स्थापित कर चलने की जरूरत है. बोर्ड से बच्चे पास आउट होंगे, तब ही उनका नामांकन उपशास्त्री कॉलेजों में सम्भव है.

राष्ट्र की ज्ञान परंपरा संस्कृत में समाहित- कुलपति

अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. लक्ष्मी निवास पांडेय ने कहा कि राष्ट्र की ज्ञान परम्परा संस्कृत में ही समाहित है. इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है. इस भाषा व ज्ञान को प्रसारित करने का बड़ा दायित्व हम संस्कृतज्ञों पर है. कहा कि पहले संस्कृत व्यवहार की भाषा थी. बीच के काल खंड के विद्वानों ने ध्यान नहीं दिया, इसलिए यह सिर्फ सभा की भाषा बन कर रह गयी और समाज को इससे लाभ भी नहीं मिला. यही कारण रहा कि यह जनभाषा नहीं बन सकी.

संस्कृत सिर्फ भाषा नहीं बल्कि विद्या- प्रो. देवनारायण

पूर्व कुलपति प्रो. देवनारायण झा ने कहा कि संस्कृत सिर्फ भाषा नहीं बल्कि विद्या है. विद्या संरक्षित होगी, तो शास्त्र संरक्षित रहेगा और राष्ट्र भी सुरक्षित होगा. ऐसे में जन-जन भी सुरक्षित रहेंगे. पुराण संकायाध्यक्ष प्रो. दिलीप कुमार झा ने संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता के बारे में बताया. वर्तमान समय में संस्कृत की उपयोगिता पर जानकारी दी. पीआरओ निशिकांत के अनुसार अतिथियों का स्वागत डीन डॉ शिवलोचन झा, धन्यवाद ज्ञापन कुलानुशासक प्रो. पुरेंद्र वरिक व संचालन डॉ रामसेवक झा ने किया.

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