कैंपस.....मिथिला की पहचान है हस्तशल्पि कला : प्रो कुंवर

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 30 Nov 2015 9:42 PM

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कैंपस…..मिथिला की पहचान है हस्तशिल्प कला : प्रो कुंवरलोकरंग महोत्सव के दूसरे दिन तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता ने कहा छह राज्यों के प्रतिनिधियों ने लिया इसमें भाग दरभंगा . ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पीजी संगीत विभाग में चल रही तीन दिवसीय भारत लोकरंग महोत्सव कार्यक्रम के दूसरे दिन सोमवार को […]

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कैंपस…..मिथिला की पहचान है हस्तशिल्प कला : प्रो कुंवरलोकरंग महोत्सव के दूसरे दिन तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता ने कहा छह राज्यों के प्रतिनिधियों ने लिया इसमें भाग दरभंगा . ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पीजी संगीत विभाग में चल रही तीन दिवसीय भारत लोकरंग महोत्सव कार्यक्रम के दूसरे दिन सोमवार को आयोजित तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए पीजी इतिहास विभाग के प्रो धर्मेंद्र कुंवर ने मिथिला की लोक कला एवं हस्तशिल्प विषय पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि मिथिला की लोक कला एवं हस्तशिल्प की अत्यंत ही प्राचीन परंपरा रही है जिससे मिथिला की पहचान बनती है. दुर्भाग्यवश ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौड़ में मिथिला संस्कृति की कलात्मक पक्षों और हस्तशिल्प का क्षय बड़े पैमाने पर हुआ है. डॉ कुंवर ने कहा कि विशेष रूप से हस्तशिल्प के ह्रास में मिथिला के दस्तकारों के समक्ष बेरोजगारी, भूखमरी की समस्याएं पैदा की. इसके कारण मिथिला के गांव उजड़ने लगे तथा लोगो ंका पलायन होने लगा और मिथिला देश का सबसे बड़ा श्रम आपूर्तिकर्ता क्षेत्र के रूप में परिणत हो गया. उन्होंने कहा कि आज बाजारवाद के रूप में एक नयी चुनौती हमारे सामने है. इसके कारण न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान ही मिटने के कगार पर पहुंच चुकी है, बल्कि मिथिला की कलाएं एवं हस्तशिल्प का अंतिम रूप से महाविनाश की पूरी संभावना पैदा हो गयी है. वहीं बीएमए कॉलेज बहेड़ी के हिंदी विभाग के शिक्षक सह मिथिला पेंटिंग के ख्यातिप्राप्त प्रो उमेश उत्पल ने विषय से संदर्भित बातों को रखते हुए कहा कि मिथिला पेंटिंग एवं गोदना एक दूसरे का पूरक है. इसलिए दोनों को एक साथ लेकर चलने की जरूरत है. जिससे दोनों संबर्धित हो सके. मधुबनी पेंटिंग केवल मधुबनी के लिए ही नहीं बल्कि पूरे मिथिलांचल के लिए है. आज लोकचित्र से रोजगार की संभावनाएं बढ़ी है. इससे मिथिला लोकचित्र के मौलिकता पर भी प्रभाव पड़ा है. मिथिला लोकचित्र को भी क्षेत्र के अनुसार कई कलमों में बांटा जा सकता है जिससे मिथिला की क्षेत्रीय पहचान बनती है. उनहोंने कहा कि मिथिला तथा गोदना लोकचित्र के संबर्धन में सरकार एवं आमलोगों को भी आगे आना आवश्यक हो गया है, तभी हमलोग कला के इस सांस्कृतिक परंपरा को बचा सकते हैं. संगीत विभाग के डॉ वेदप्रकाश ने कहा कि मिथिला की संस्कृति वैदिक संस्कृति की प्रतिमान्य रही है. वैश्वीकरण के दौड़ में बाजारवाद संगीत पर भी हावी हो गया है. इसे भी हमलोग व्यवसाय से जोड़ने लगे हैं. हमारे संस्कार की तरह पुराने संगीत भी छूटते जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि लोक संगीत की व्यावसायिक पक्ष धनोपार्जन है. उसे हमारे संस्कृति से कोई मतलब नहीं है. उन्होंने कहा कि संगीत का अपना कोई स्वरूप नहीं होता है. उसे जरूरत के मुताबिक बनाया और बिगाड़ा जाता है. लोक संगीत हमारी अतीत है. हमारे सामने इसकी परिवर्तित रूप चुनौती है. डॉ प्रकाश ने गायिका शारदा सिन्हा के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि उन्हीं के कारण वर्तमान दिनों में हम अपनी संस्कार से संबंधित पौराणिक गीतों से नयी पीढ़ी को परिचित करवा पाने में सफल होते हैं. इस सत्र की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ पुष्पम नारायण ने की. कार्यक्रम का संचालन सागर सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ लावण्या कीर्ति सिंह ने किया. मिथिला लोकरंग महोत्सव का आयोजन पूर्व क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र कोलकाता एवं दक्षिण क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र नागपुर तथा लनामिवि के पीजी संगीत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में चल रही है. तकनीकी सत्र के उपरांत आसाम के ओर से मुखाभावना एवं जम्मु व कश्मीर की ओर से बांधपाथेर नाटक का मंचन किया गया.

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