पुश्तैनी पेशा को छोड़ने लगे हैं गुड़ उत्पादक

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 15 Nov 2015 6:59 PM

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पुश्तैनी पेशा को छोड़ने लगे हैं गुड़ उत्पादक फोटो संख्या- 42परिचय- बैगनी में गुड़ तैयार करती महिला.बेनीपुर. देश-दुनिया को मिठास पहुंचाने वाले गन्ना एवं मिथिलांचल के गुड़ उत्पादकों के भाग्य में सरकारी उदासीनता के कारण शायद सीट्ठी ही सिट्ठी है. मिथिलांचल के एक मात्र नकदी फसल गन्ना की खेती से किसान अब मुंह मोड़ने लगे […]

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पुश्तैनी पेशा को छोड़ने लगे हैं गुड़ उत्पादक फोटो संख्या- 42परिचय- बैगनी में गुड़ तैयार करती महिला.बेनीपुर. देश-दुनिया को मिठास पहुंचाने वाले गन्ना एवं मिथिलांचल के गुड़ उत्पादकों के भाग्य में सरकारी उदासीनता के कारण शायद सीट्ठी ही सिट्ठी है. मिथिलांचल के एक मात्र नकदी फसल गन्ना की खेती से किसान अब मुंह मोड़ने लगे हैं. वहीं क्षेत्र के गुड़ उत्पादक भी अपनी पुश्तैनी पेशा छोड़ रोजगार की तलाश में परदेश को पलायन करने लगे हैं. ऐसा माना जाता है कि पूर्व में यहां के किसान अपने जोत के आधे रकबे में गन्ना की ही खेती करते थे और आधे में अन्य फसल. इसी गन्ने की खेती के बल पर उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ बनी रहती थी. इतना ही नहीं, किसानों के बेटी की शादी, बेटे का जनेऊ, भवन निर्माण आदि जैसे महत्वाकांक्षी योजनाओं का बजट इसी पर आधारित होता था. योजना के अनुरूप किसान गन्ना की खेती में वृद्धि कर देते थे तथा उसी के कीमत से सारा काम हो जाता था. पर गन्ने की वह मिठास अब किसानों के पाले में नहीं रही, जिसका मुख्य कारण क्षेत्र के सभी चीनी मिलों का बंद होना है. फिर भी विकल्पहीनता की स्थिति में जो किसान गन्ने की खेती करते हैं, उन्हें निजी गुड़ उत्पादकों (क्रौसर चालकों) के हाथ दोहन एवं शोषण का शिकार होना पड़ता है. रविवार को बैगनी गांव में गन्ना बेचने आये मोतीपुर के किसान शंभु यादव बताते हैं कि गन्ना की खेती मेरा पुश्तैनी खेती है. मिल बंद होने के बाद से वैसे तो गन्ना की खेती कम कर दिया है, फिर भी प्रतिवर्ष डेढ़ से दो बिघा में जरूर लगाते हैं. उसे औने-पौने दाम में क्रसर चालकों के हाथों बेचना पड़ता है. उन्होंने कहा कि हर वस्तु का दाम आसमान छू रहा है, पर ईख के दामों की कीमत जस की तस बनी हुई है. क्रसर संचालक का मनमानी चल रहा है. उन्हीं के मुताबिक ईख का मूल्य निर्धारण होता है तथा ईंट-पत्थर के बाट से वजन कर ईख खरीदता है. इतना ही नहीं, ईख वजन के बाद उसके यहां पैसे के लिए महीनों चक्कर लगाना पड़ता है. जिसका भुगतान वे अपने सुविधानुसार करते हैं. फिर भी इन सब परेशानी के बावजूद धन्यवाद के पात्र वहीं क्रसर संचालक हैं, जिनके हाथों हम किसानों का ईख तो बिक जाता है. यदि ये लोग भी ईख लेना बंद कर दें तो उपजे ईख को खेत में ही जला देने के बजाय दूसरा कोई विकल्प नहीं रह जायेगा. वहीं ईख उत्पादक एवं क्रसर संचालक के बीच ‘गैया रोवे आपके, कसैया रोवे आपके’ वाली कहावत चरितार्थ हो रहा है. जहां ईख उत्पादक अपने मुनाफे के अधिकांश हिस्सा क्रसर संचालक भी अपने इस पेशे से खुश नहीं दिख रहे हैं. बैगनी के क्रसर संचालक जोगेंद्र साहु, मनोज साहु, रामभरोस साहु आदि ने कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में अब यह पेशा फायदेमंद नहीं रहा पर जीविकोपार्जन का दूसरा चारा नहीं है. इसलिए इसे माने तो ढो रहे हैं. इस उद्योग में मेहनत एवं लागत के अनुरूप मुनाफा नहीं हो रहा है. फिर भी पूरे परिवार के लोग दिन-रात लगे रहते हैं. उसके बाद तैयार गुड़ एवं राब को बेचने के लिए महीनों व्यापारियों का प्रतीक्षा करना पड़ता है. पूंजी के अभाव में महाजन से कर्ज लेकर व्यापार करता हूं पर बाजार नहीं होने के कारण मुनाफे का अधिकांश हिस्सा महाजन को ही देना पड़ रहा है. साथ ही ऊपर से गन्ना विभाग एवं मापतौल के बाबुओं को नजराना भी देना पड़ता है. सरकार द्वारा कोई सहायता नहीं दिया जाता है. सरकार द्वारा इसके उद्योग का दर्जा देकर कुछ सहायता देते तो हम क्रसर चालकों का भी दिन बहुर सकता था.

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