उद्धारक के इंतजार में खादी ग्रामोद्योग केंद्र
उद्धारक के इंतजार में खादी ग्रामोद्योग केंद्र जमीन पर हो रहा अवैध कब्जाफोटो- 22परिचय- सारामोहनपुर गांव में खादी ग्रामोद्योग का खंडहर भवन.सदर. सारामोहनपुर का बिहार राज्य खादी ग्राम उद्योग केंद्र कई वर्षों से बंद पड़ा है. 25 वर्ष पूर्व बंद हुए यह केंद्र भवन अब जर्जर स्थिति में पहुंच चुका है. बताया जा रहा है […]
उद्धारक के इंतजार में खादी ग्रामोद्योग केंद्र जमीन पर हो रहा अवैध कब्जाफोटो- 22परिचय- सारामोहनपुर गांव में खादी ग्रामोद्योग का खंडहर भवन.सदर. सारामोहनपुर का बिहार राज्य खादी ग्राम उद्योग केंद्र कई वर्षों से बंद पड़ा है. 25 वर्ष पूर्व बंद हुए यह केंद्र भवन अब जर्जर स्थिति में पहुंच चुका है. बताया जा रहा है कि वर्ष 1962 में बोर्ड द्वारा खादी ग्रामोद्योग केंद्र संचालित कराया गया था. शुरुआत में यहां आइटीआइ केंद्र खोला गया. इसमें विशेषकर कुम्हार जाति के युवाओं को कई कला कृतियाें का निर्माण के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था. धीरे धीरे केंद्र को विस्तारित कर प्रशिक्षित युवकों द्वारा तैयार किये गये कई तरह के कलाकृतियों के मूर्ति एवं बर्त्तन को पकाने के लिए दो बड़े व छोटे चिमनी बनाया गया. इसके पश्चात चरखा उद्योग भी शुरू किया गया. यहां महिलाएं व पुरुष चरखे से सूत तैयार करते थे. आज ये सब बेकार पड़ चुके हैं. गोदामों में बंद चरखा नष्ट हो चुका है. दोनों चिमनी ध्वस्त होने के कगार पर है. जर्जर हो चुके भवन भी अतिक्रमित हो चुका है. वर्त्तमान में परिसर देखने से ही जानवरों का चरागाह नजर आ रहा है. शनिवार को सारामोहनपुर गांव में लगे चुनावी चौपाल में शामिल ग्रामीणों ने इस मुद्दे पर जमकर चर्चा की. कहते हैं स्थानीय लोगबेलहा मोहनपुर के 65 वर्षीय रामकृपाल सहनी का कहना है कि जिस समय यहां केंद्र का संचालन शुरू कराया गया था उस वक्त आस पड़ोस के ग्रामीण भी इससे प्रसन्न थे. 7 एकड़ में केंद्र का निर्माण हुआ था. उस समय बोर्ड के अध्यक्ष कांग्रेसी नेता प्रेमचंद्र शास्त्री थे. उन्होंने ही अपने प्रयास से दरभंगा महाराज के संबंधी मुकुंद झा से जमीन की व्यवस्था कर शुरू कराया था. स्थानीय रंजीत सहनी ने कहा कि आज यह उद्योग केंद्र चालू रहता तो यहां के युवकों को अधिक से अधिक रोजगार मिलता. इलाके में घर घर खुशहाली रहती. यहां चप्पल, जूता, मधुमक्खी पालन, चरखा उद्योग सहित टाइल्स निर्माण का प्रशिक्षण दिया जाता था. वहीं रामस्वरुप यादव का कहना था कि तीन हजार की आबादी वाले इस गांव में एक भी विद्यालय नहीं है. बच्चों को काफी दूर चलकर दूसरे गांव में शिक्षा के लिए जाना पड़ता है.
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