एक दिन पैकेट मिलल रहे, ओकरा बाद...

मोतिहारी : लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’. शायर बसीर बद्र ने यह शेर भले ही इतर संदर्भ में लिखी हो. लेकिन, जिले में बाढ़ की विभीषिका ने उजारे कई सपनों के आशियाने पर यह शेर सटीक बैठती है. बाढ़ ने आशियाने ही नहीं, बल्कि बाढ़ […]
मोतिहारी : लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’. शायर बसीर बद्र ने यह शेर भले ही इतर संदर्भ में लिखी हो. लेकिन, जिले में बाढ़ की विभीषिका ने उजारे कई सपनों के आशियाने पर यह शेर सटीक बैठती है. बाढ़ ने आशियाने ही नहीं, बल्कि बाढ़ पीड़ितों जिंदगी व्यापक असर डाला है,
जो उम्र भर के दर्द से कम नहीं. स्थिति यह है कि नंदपुर गांव के लोगों को बाढ़ ने सड़कों पर ला दिया है. उनके घरों में बाढ़ का पानी अब भी जमा है. कब अपने घर में जायेंगे, उनके लिए अब भी यह बड़ा सवाल है.
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