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बिहार की अनोखी होली: कहीं भस्म से खेलते हैं रंग, तो कहीं फूलों की होती है वर्षा

Updated at : 14 Mar 2025 7:00 AM (IST)
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bihar bhasm holi| Bihar's unique Holi: Where traditions play more than colors

भस्म होली की तस्वीर

Bihar unique Holi: बिहार में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि परंपरा, भक्ति और उत्सव का अनूठा संगम है. यहां हर क्षेत्र में होली मनाने का अंदाज अलग है. भागलपुर में भस्म होली, दरभंगा में शाही होली, गया-पटना में फूलों की होली और पूर्णिया में राख से होली खेली जाती है. मिथिला में यह पर्व राम-सीता के प्रेम और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ा हुआ है. बिहार की यह अनूठी होली इसे पूरे देश में खास बनाती है.

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Bihar unique Holi: बिहार, जहां इतिहास, संस्कृति और परंपराओं की गूंज हर उत्सव में सुनाई देती है. वहां होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि परंपराओं और आस्थाओं का एक अनुपम संगम है. इस पावन भूमि पर होली को हर क्षेत्र में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है. कहीं भस्म और मिट्टी से शिवभक्ति प्रकट की जाती है, तो कहीं फूलों से होली खेलकर भगवान की आराधना होती है. कभी दरभंगा के राजमहल में होली शाही अंदाज़ में मनाई जाती थी तो पूर्णिया के धरहरा गांव में होलिका दहन के बाद बची राख से उत्सव मनाने की परंपरा है. आइए, जानते हैं बिहार की इन अनूठी होली परंपराओं को, जो इसे पूरे देश में अलग पहचान दिलाती हैं.

भागलपुर की भस्म होली: जहां शिवभक्तों के रंग होते हैं अलग

अगर आप रंगों से अलग हटकर कुछ अनोखा देखना चाहते हैं, तो आपको भागलपुर की भस्म होली जरूर देखनी चाहिए. यह परंपरा काशी की मशहूर मसान होली की झलक देती है, जहां शिवभक्त रंगों की जगह चिता की भस्म और मिट्टी से होली खेलते हैं.

कहा जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने अपने गणों के साथ चिता की राख से होली खेली थी, तभी से उनके अनुयायी इस अनूठी परंपरा को निभाते आ रहे हैं. होली के दिन भागलपुर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जहां “हर-हर महादेव” के जयघोष के बीच भक्त एक-दूसरे पर भस्म लगाकर शिवभक्ति का परिचय देते हैं. यह परंपरा न केवल आस्था और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि जीवन क्षणभंगुर है और अंत में सबकुछ मिट्टी में ही मिल जाता है.

दरभंगा राज की शाही होली: जहां रंगों में घुलती थी नवाबी शान

कभी मिथिला की आन-बान और शान रहे दरभंगा राज में होली का उत्सव किसी शाही जलसे से कम नहीं होता था. महाराज अपने दरबार में कलाकारों, गायकों और नर्तकियों को आमंत्रित करते थे. जहां ढोल-नगाड़ों की गूंज, रंगों की बौछार और पारंपरिक गीतों के साथ होली का भव्य आयोजन किया जाता था.

दरभंगा राज की होली में गुलाल और अबीर की बारिश होती थी और राजमहल के विशाल आंगन में हजारों लोगों के लिए भव्य भोज का आयोजन किया जाता था. हालांकि, आज यह परंपरा धीरे-धीरे धुंधली हो रही है, लेकिन मिथिला क्षेत्र के कई इलाकों में आज भी इस शाही होली की यादें ताज़ा हैं.

फूलों की होली: जब बिहार के मंदिर बन जाते हैं वृंदावन

अगर आप वृंदावन की फूलों वाली होली को देखने से चूक गए हैं, तो बिहार के गया और पटना के मंदिरों में होली देखने जरूर जाएं. यहां कई मंदिरों में परंपरागत रूप से फूलों की होली खेली जाती है, जिसे “सत्संग होली” भी कहा जाता है.

गया के प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर और पटना के महावीर मंदिर में यह परंपरा हर साल निभाई जाती है. यहां पुजारी पहले भगवान को रंगों और फूलों से सजाते हैं, फिर श्रद्धालु एक-दूसरे पर फूलों की वर्षा कर होली का आनंद लेते हैं. यह होली केवल उल्लास का प्रतीक नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता से भी जुड़ी हुई है, जहां भक्तिमय रंगों में सराबोर होकर लोग अपने ईश्वर के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं.

धरहरा गांव की राख होली: जब होलिका दहन के बाद उड़ते हैं शुभ संकेत

पूर्णिया जिले का धरहरा गांव अपनी अनोखी होली परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां रंगों की जगह राख से होली खेली जाती है. यह सुनने में भले ही असामान्य लगे, लेकिन इस परंपरा के पीछे एक गहरी मान्यता है. कहा जाता है कि इसी स्थान पर भगवान नरसिंह ने अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया था. जिससे होलिका दहन की परंपरा की शुरुआत हुई. तब से यहां के लोग होलिका दहन के बाद बची हुई राख को पवित्र मानते हैं और एक-दूसरे पर उड़ाकर होली खेलते हैं. यह होली शुद्धिकरण और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानी जाती है. होलिका दहन की परम्परा से जुड़ी पूर्णिया के इस ऐतिहासिक स्थल पर हर वर्ष विदेशी सैलानी आते हैं और कई फिल्मों की शूटिंग भी यहां हो चुकी है.

मिथिला की अनूठी होली: राम-सीता के प्रेम में रंगा जनकपुर

मिथिला में होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि श्रीराम और माता सीता के दिव्य प्रेम का उत्सव भी है. हर साल फाल्गुन मास में लाखों श्रद्धालु “सीताराम” धुन के साथ नंगे पांव पदयात्रा करते हैं, जो जनकपुर और उसके परकोटा परिक्षेत्र की परिक्रमा होती है.

इस यात्रा की शुरुआत कलनेश्वर महादेव मंदिर से होती है और समापन जनकपुर धाम में. भक्तगण राम-सीता से जुड़े पावन स्थलों की यात्रा करते हैं, और दो भव्य पालकियां नगर भ्रमण करती हैं. भक्ति और उल्लास से भरी यह परंपरा मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखती है. मिथिला में होली का त्योहार रंगों से ज्यादा स्वाद और ठंडाई के लिए जाना जाता है. यहां के लोग पारंपरिक व्यंजनों के साथ इस पर्व का आनंद लेते हैं.

भांग की ठंडाई, गुजिया, पुआ और मालपुए से सजी होली की दावत मिथिला क्षेत्र की खासियत है. साथ ही, महिलाएं पारंपरिक गीत गाकर अपने देवर-जेठ से हंसी-ठिठोली करती हैं, जिसे “होलीका गान” कहा जाता है. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा है.

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बिहार की होली: संस्कृति, भक्ति और रंगों का अद्भुत संगम

बिहार की होली केवल गुलाल और अबीर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परंपराओं, श्रद्धा और भक्ति का एक रंगीन संगम है. यहां की हर होली एक कहानी कहती है- भागलपुर की भस्म होली शिवभक्ति का प्रतीक है, दरभंगा की शाही होली ऐतिहासिक गौरव को दर्शाती है. फूलों की होली भक्तिमय रंगों में सराबोर करती है, धरहरा की राख होली पवित्रता का संदेश देती है और मिथिला की होली स्वाद और मस्ती का अनूठा मेल प्रस्तुत करती है. तो इस बार जब होली के रंग उड़ें, तो बिहार की इन अनोखी परंपराओं को जरूर याद करें और इस पर्व को उल्लास, प्रेम और भक्ति के साथ मनाएं.

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Abhinandan Pandey

लेखक के बारे में

By Abhinandan Pandey

भोपाल से शुरू हुई पत्रकारिता की यात्रा ने बंसल न्यूज (MP/CG) और दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अनुभव लेते हुए अब प्रभात खबर डिजिटल तक का मुकाम तय किया है. वर्तमान में पटना में कार्यरत हूं और बिहार की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को करीब से समझने का प्रयास कर रहा हूं. गौतम बुद्ध, चाणक्य और आर्यभट की धरती से होने का गर्व है. देश-विदेश की घटनाओं, बिहार की राजनीति, और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि रखता हूं. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स के साथ प्रयोग करना पसंद है.

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