क्या पुतिन से नजदीकियों की वजह से ट्रंप ने जेलेंस्की को व्हाइट हाउस से बाहर निकाला?
ट्रंप और जेलेंस्की
Trump Zelensky :: रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने सार्वजनिक तौर पर कैमरे से सामने एक दूसरे को देख लेने के अंदाज में बहस की. जिस तरह ट्रंप और पुतिन ने नए रिश्तों के शुरुआत की बात की है, संभवत: यह टकराहट उसी की शुरुआत थी या बात कुछ और है?
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Trump Zelensky : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के साथ कैमरे के सामने जिस तरह की तू-तू मैं मैं हुई, वह 21वीं शताब्दी के लिए अनहोनी घटना है. दो देशों के राष्ट्राध्यक्ष वह भी कैमरे के सामने अगर इस तरह से एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करेंगे, तो उसका असर पूरे विश्व पर पड़ेगा. जलेंस्की और ट्रंप खनिज सौदे को लेकर एक साथ आए थे. इन दोनों के बीच व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में वार्ता हो रही थी. शुरुआत अच्छी थी और दोनों एक दूसरे के साथ सहज भी थे, लेकिन अचानक वार्ता में नाटकीय मोड़ आया और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चेतावनी तक पहुंच गया, स्थिति इतनी बिगड़ी कि जेलेंस्की को व्हाइट हाउस से जाने तक के लिए कह दिया गया.
जेलेंस्की और ट्रंप के बीच वार्ता में क्यों हुआ टकराव
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और ट्रंप के बीच होने वाले समझौते के बीच टकराहट तब हुई जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने जेलेंस्की से युद्ध विराम की बात की. उन्होंने कहा कि कूटनीति के तहत इस समस्या का समाधान निकाला जाना चाहिए. वेंस की इस बात से जेलेंस्की नाराज हो गए और कहने लगे कि कौन सी कूटनीति? फिर बात इतनी बढ़ी कि जेलेंस्की को व्हाइट हाउस छोड़ना पड़ा. ट्रंप खीजे हुए नजर आए और जेलेंस्की को चेतावनी तक दे दी.
ट्रंप और जेलेंस्की के बीच विवाद नया नहीं 2019 में भी हो चुकी थी नोकझोंक

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और जेलेंस्की के बीच शुरू से ही रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं. बताया जाता है कि 2019 में इनके बीच फोन कॉल पर बहस हुई थी. इस विवादास्पद फोन कॉल की वजह से ट्रंप को पहली बार महाभियोग का सामना करना पड़ा था, हालांकि वह बरी हो गए थे. ट्रंप पर आरोप था कि उन्होंने अमेरिकी सैन्य सहायता के बदले जेलेंस्की पर जो बाइडेन के बेटे हंटर बाइडेन की जांच करने का दबाव डाला था. हालांकि यह बातचीत सार्वजनिक नहीं हुई थी, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव जरूर उत्पन्न हो गया था. हंटर बाइडेन एक यूक्रेनी कंपनी में निदेशक थे.
अमेरिका फर्स्ट की नीति के लिए ट्रंप क्या कर सकते हैं पूरे विश्व ने देखा : केवी प्रसाद
Indian Parliament Shaping Foreign Policy के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार केवी प्रसाद ने बताया कि ट्रंप और जेलेंस्की के बीच जो कुछ हुआ, उसे पूरे विश्व ने देखा और सबको इस बात का पता चल गया है कि ट्रंप किस तरह का व्यवहार कर सकते हैं. चुनाव में जीत के आने के बाद से ही वे अमेरिका फर्स्ट और मेकिंग अमेरिका की नीति पर काम कर रहे हैं. अब यह और भी स्पष्ट हो गया है कि वे अपने देश के हित के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. दरअसल वे युद्ध विराम चाहते हैं ताकि फिजूलखर्ची को बंद किया जा सके. पिछले कुछ समय से उन्होंने जिस तरह के निर्णय लिए और अपने देश में भी फिजूलखर्ची बंद की, वो इसका प्रमाण है.
ट्रंप जेलेंस्की को यूं ही मदद नहीं देना चाहते हैं. वे यह चाहते हैं कि जेलेंस्की को अमेरिका अगर मदद कर रहा है तो बदले में वो उन्हें खनिज दें. दोनों नेताओं की मुलाकात भी इसी मसले को लेकर हो रही थी. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि जेलेंस्की भी अपना खनिज देने के एवज में अमेरिका से मदद चाहते हैं.
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जहां तक इस टकराहट का विश्व पर प्रभाव का मसला है, तो निश्चित तौर पर हर देश ट्रंप के व्यवहार से परिचित हुआ है. उन्हें यह समझ आ गया है कि अब हर देश को अपना हित देखना होगा. भारत के लिए तो यह संतोष का विषय है कि ट्रंप और मोदी के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं. हाल में जब पीएम मोदी वहां गए थे तो टैरिफ सहित अन्य कई मुद्दों पर बात भी हुई. दोनों देश अपने हितों के अनुसार ही अपनी नीति बनाएंगे और उसके अनुसार आचरण करेंगे. रास्ता इसी के बीच से निकलेगा.
ट्रंप-जेलेंस्की विवाद पर यूरोप की प्रतिक्रिया
ट्रंप ने जेलेंस्की को तानाशाह करार दिया और कहा कि यह आदमी युद्ध विराम नहीं चाहता. इसके बाद पूरा यूरोप जेलेंस्की के पक्ष में नजर आ रहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैंक्रो ने जेलेंस्की का समर्थन किया और रूस को हमलावर बताया. वहीं यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वोन डेर लेयेन भी जेलेंस्की की साइड ली और उनके हिम्मत की दाद दी.जर्मनी भी जेलेंस्की के साथ दिखा, जबकि इटली ने कूटनीतिक पहल की बात कही. अमेरिका के सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने राष्ट्रपति ट्रंप और उपराष्ट्रपति वेंस की आलोचना की और कहा कि जलेंस्की के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया है. अमेरिकी लोग यूक्रेन के साथ खड़े हैं, भले ही राष्ट्रपति ट्रंप पुतिन के साथ हों.
ट्रंप और पुतिन के बीच बढ़ी है नजदीकियां
अमेरिका और रूस दो ऐसे देश हैं, जिनके बीच काफी लंबे समय से विवाद रहा है. लेकिन अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद दोनों देशों के बीच नफरत की आंच थोड़ी कम हुई है. सऊदी अरब में हुई बातचीत के बाद दोनों देश संबंधों की नई शुरुआत करने पर विचार कर रहे हैं. पुतिन और ट्रंप ने फोन पर भी बात की, जिसके बाद जेलेंस्की थोड़े परेशान नजर आए, क्योंकि ट्रंप अगर रूस की ओर जाते हैं, तो इसका असर रूस-यूक्रेन के बीच जारी युद्ध पर पड़ेगा. जेलेंस्की यह चाहते हैं कि ट्रंप दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करें. ट्रंप का कहना है कि वे किसी के भी साथ नहीं हैं. वे क्षेत्र में शांति चाहते हैं और वे यह भी कह चुके हैं कि संघर्ष विराम की स्थिति में उन्हें वो जमीनें छोड़नी होंगी जो तीन साल के युद्ध में रूस ने अपने कब्जे में कर लिया है.
रूस-यूक्रेन युद्ध की क्या है वजह?

रूस-यूक्रेन के बीच 20 फरवरी 2022 से युद्ध जारी है. इसके पीछे कई वजह हैं, सबसे बड़ी वजह यह है कि रूस यह मानता है कि यूक्रेन उसका हिस्सा है. यूक्रेन नाटो का हिस्सा बनना चाहता है, जिसकी वजह से रूस नाराज था. रूस ने अलगाववादियों को सहायता दी और वह इस बात से भी नाराज था कि यूक्रेन सोवियत संघ से अलग हुआ. यूक्रेन यूरोप के साथ जाना चाहता था, जिसकी वजह से रूस ने उसपर हमला किया.
इतिहास में पहले भी सार्वजनिक तौर पर भिड़ चुके हैं ये राष्ट्राध्यक्ष
अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और रूसी प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव के बीच 1959 में प्रेस के सामने गरमागरम बहस हो गई थी. उस वक्त निक्सन मॉस्को यात्रा पर था. प्रेस के सामने दोनों नेता पूंजीवाद बनाम साम्यवाद को लेकर भिड़ गए थे और दोनों ने आक्रामक तरीके से अपनी राजनीतिक व्यवस्था का बचाव किया था. उनका यह विवाद खूब चर्चा में भी रहा था.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच 2018 में नाटो फंडिंग और व्यापार को लेकर टकराव हुआ था. ट्रंप ने ट्विटर पर मैक्रों का मजाक उड़ाया था, जिसकी वजह से कूटनीतिक विवाद हुआ. बाद में मैक्रो ने राष्ट्रवाद के खतरों के बारे में चेतावनी देते हुए भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने ट्रंप की आलोचना की थी.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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