ऐसे लगेंगे समरसेबल, तो भोजपुर भी बन जायेगा लातूर

समरसेबल पंप लगाने से पानी की हो रही बरबादी धरती के दोहन की तैयारी युद्ध स्तर पर है जारी जिस प्रकार धरती का जलस्तर नीचे गया है. आज शहर हो या गांव, हर तरफ चापाकलों के स्थान पर समरसेबल पंप ही लगाये जा रहे हैं. जिधर देखो, उधर समरसेबल पंप ही लगायी जा रही है. […]
समरसेबल पंप लगाने से पानी की हो रही बरबादी
धरती के दोहन की तैयारी युद्ध स्तर पर है जारी
जिस प्रकार धरती का जलस्तर नीचे गया है. आज शहर हो या गांव, हर तरफ चापाकलों के स्थान पर समरसेबल पंप ही लगाये जा रहे हैं. जिधर देखो, उधर समरसेबल पंप ही लगायी जा रही है. लेकिन इस समरसेबल पंप के बारे में किसी को कोई खास जानकारी है. सिर्फ लोग उतना ही जानते हैं कि यह पंप धरती के नीचे में चलता है और नीचे से बहुत ही तेज गति से प्रेशर के साथ पानी को उपर की ओर फेंकता है.
लेकिन इस संबंध में बहुतेरे लोगों को पता नहीं है कि जहां भी यह पंप लगता है, वहां धरती के गर्भ में आसपास के एक बहुत बड़े क्षेत्र के पानी को भी खिंच लेता है. यह 7-8 मिनट में एक हजार लीटर की टंकी को भर देता है. ऐसे में अब हर कोई समरसेबल पंप ही लगा रहे हैं और एक साथ बड़े पैमाने पर धरती से पानी के दोहन की तैयारी चल रही है. तब सवाल है कि धरती में कितना पानी है. यह किसी को पता नहीं है?
क्या भोजपुर में भी हो सकती है लातूर की तरह जलसंकट की िस्थति
महाराष्ट्र के लातूर जिले में जिस प्रकार जलसंकट उत्पन्न हुआ है. इसकी सभी को जानकारी है. वर्तमान में वहां रेलगाड़ी से पानी को पहुंचाया जा रहा है और लोगों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है. अगर वहां धरती में पानी होता, तो सरकार बड़़ी-बडी बोरिगें लगा कर पानी की नदी बहा देती. फिर रेलगाड़ी से पानी पहुंचाने जैसी अति खर्चीली प्रयास नहीं करती. तब समरसेबल पंप से युद्ध स्तर पर हो रही धरती के दोहन की तैयारी पर सरकार को अवश्य विचार करना चाहिए. अन्यथा क्या पता कि कब क्या होगा?
चापाकल और समरसेबल में बहुत हैं फर्क
आप हम अंदाजा लगा सकते हैं कि चापाकल हाथ से चलते थे. जिस कारण धरती से पानी का दोहन ज्यादा नहीं हो पाता था. लेकिन समरसेबल पंप बिजली से चलते हैं. कहा जाता है कि 7-8 मिनट में एक हजार लीटर की टंकी को भर देता है. इसकी पानी निकालने की गति इतनी तेज होती है कि देखते-ही-देखते धरती के कोख को सूखा देने की शक्ति होती है. अब हर कोई ऐसा करने लगे, तो पानी की बर्बादी अवश्य होगी.
इसमें किसी तरह के संदेह की गुंजाइश नहीं होगी. तब आने वाले भविष्य की कल्पना तो की ही जा सकती है. इसका कहने का तात्पर्य यह है कि यहां भी लातूर या अन्य जगहों की स्थिति उत्पन्न न हो, इस पर प्रशासन या सरकार को अवश्य ही गौर करना चाहिए.
धरती के दोहन से लोगों को होगी परेशानी
प्रशासन व सरकार को इसके प्रति होना होगा गंभीर
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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