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जिले में दम तोड़ रहीं मत्स्य विभाग की योजनाएं, लक्ष्य से कोसों दूर

आरा : जिले में सरकार द्वारा चलायी जा रही मत्स्य योजनाएं दम तोड़ रही है. जिले के लिए सरकार द्वारा मत्स्य विभाग की योजनाएं के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था. वह अब भी कोसों दूर है. जबकि वर्तमान में वित्तीय वर्ष को समाप्त होने में लगभग तीन माह ही शेष रह गये हैं. […]

आरा : जिले में सरकार द्वारा चलायी जा रही मत्स्य योजनाएं दम तोड़ रही है. जिले के लिए सरकार द्वारा मत्स्य विभाग की योजनाएं के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था. वह अब भी कोसों दूर है. जबकि वर्तमान में वित्तीय वर्ष को समाप्त होने में लगभग तीन माह ही शेष रह गये हैं. इससे मत्स्य विभाग की योजनाओं का लाभ उठाने तथा रोजगार पाने के लिए उम्मीद लगाये लोगों को काफी निराशा हाथ लगी है. खासकर युवाओं को बेरोजगारी के दंश से मुक्ति नहीं मिल पा रही है.

जिले के युवा मछलीपालन कर रोजगार पाने के लिए अब भी तरस रहे हैं, पर विभाग की सुस्त कार्य प्रणाली व कार्य में पारदर्शिता की कमी के कारण योजनाएं सफलता की डगर पर आगे नहीं बढ़ पा रही है. दम तोड़ती मत्स्य विभाग की योजनाओं से लोग काफी परेशान हैं. वहीं जिले में मछली उत्पादन का दायरा नहीं बढ़ पा रहा है. इस कारण मछली के लिए लोगों को बाहर से की जानेवाली आपूर्ति पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है.

मत्स्य विभाग की योजनाओं का लक्ष्य है कोसों दूर : जिले में मत्स्य विभाग की योजनाएं लक्ष्य से अब भी काफी दूर है, जबकि वर्तमान वित्तीय वर्ष को समाप्त होने में महज दो माह से कुछ ही अधिक समय शेष रह गये हैं. विभाग की लालफीताशाही योजनाओं की पूर्ति में बाधा आ रही है. सरकार ने सामान्य कोटि सहित अनुसूचित जाति/ जनजाति के लिए कई तरह की योजनाएं चलायी हैं, जिनका जिले में क्रियान्वयन किया जाना है, पर इनका क्रियान्वयन नहीं होने से लोगों को काफी परेशानी हो रही है.
मछलीपालन में काफी पीछे है जिला, युवाओं को भी नहीं मिल रहा है रोजगार : मत्स्य विभाग की सुस्त कार्य प्रणाली व पारदर्शिता में कमी के कारण मछलीपालन में जिला काफी पीछे है. वहीं योजनाओं पर अमल नहीं होने के कारण युवाओं सहित मछली पालन की इच्छा रखने वाले लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है. इससे जिलावासियों को काफी परेशानी हो रही है.
150 क्विंटल मछली का जिले में है प्रतिदिन खपत : जिले में 150 क्विंटल मछली का प्रतिदिन खपत है, पर उत्पादन महज पूरे वर्ष में महज 50 क्विंटल ही मछली का उत्पादन होता है. इससे समझा जा सकता है कि इस क्षेत्र में काफी संभावनाएं है. विभाग की योजनाओं पर ईमानदारी से कार्य किया जाये तो काफी संख्या में लोगों सहित युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकते हैं. इतना ही नहीं जिले से बाहर जानेवाले राजस्व की भी बचत होगी. भोजपुर में बंगाल, आंध्र प्रदेश व तामिलनाडु से मछली की आपूर्ति की जाती है.
मछलीपालन कर रोजगार के लिए तरसते रहे लोग
महज 50 क्विंटल ही होता है मछली का उत्पादन
निर्धारित किया गया है लक्ष्य
सरकार ने मत्स्य विभाग के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिसमें मुख्यमंत्री मत्स्य विभाग परियोजना, नीली क्रांति योजना तथा अनुसूचित जाति /जनजाति योजना शामिल है. मुख्यमंत्री मत्स्य विकास परियोजना के तहत रियरिंग तालाब निर्माण योजना, ट्यूबवेल अधिष्ठापन योजना तथा पंपसेट अधिष्ठापन योजना का क्रियान्वयन होना है. अनुसूचित जाति /जनजाति योजना के तहत नर्सरी तालाब निर्माण योजना शामिल है. वहीं नीली क्रांति योजना के तहत आर्द्र भूमि में तालाब निर्माण योजना शामिल है. मुख्यमंत्री मत्स्य विकास योजना के तहत रियरिंग तालाब निर्माण का लक्ष्य 15 निर्धारित है. वहीं नीली क्रांति योजना के तहत 20 तालाब निर्माण का लक्ष्य निर्धारित है, जबकि अनुसूचित जाति /जनजाति योजना के तहत 12 तालाब निर्माण का लक्ष्य निर्धारित है.
क्या कहते हैं अधिकारी
कई योजनाएं के लिए कार्यादेश निकाला जा चुका है. उस पर अविलंब धरातल पर कार्रवाई की जायेगी, ताकि लोगों को इसका लाभ मिल सके.
डॉ नूतन, जिला मत्स्य पदाधिकारी

Prabhat Khabar Digital Desk
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