बिहार में जूट से बैग बना कर भिक्षु् बन रहे आत्मनिर्भर, अब तक 30 से अधिक लोगों की बदली जिंदगी

Updated at : 12 Jul 2022 9:52 AM (IST)
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बिहार में जूट से बैग बना कर भिक्षु् बन रहे आत्मनिर्भर, अब तक 30 से अधिक लोगों की बदली जिंदगी

समाज कल्याण विभाग की ओर से भिक्षुकों को रोजगार देने के लिए और उन्हें भिक्षावृत्ति करने से रोकने के लिए भिक्षुकों का समूह बनाया गया. इसका नाम मुक्ता सक्षम उत्पादक समूह रखा गया. इसमें भिक्षुकों को जूट से बनने वाली चीजों की ट्रेनिंग दी जाती है.

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जूही स्मिता. पटना. समाज कल्याण विभाग की ओर से भिक्षुकों को रोजगार देने के लिए और उन्हें भिक्षावृत्ति करने से रोकने के लिए भिक्षुकों का समूह बनाया गया. इसका नाम मुक्ता सक्षम उत्पादक समूह रखा गया. इसमें भिक्षुकों को जूट से बनने वाली चीजों की ट्रेनिंग दी जाती है और विभिन्न जगहों से मिलने वाले ऑर्डर भी इनके द्वारा तैयार किये जाते हैं.

समाज कल्याण विभाग की ओर से मिला अनुदान

साल 2014 में समाज कल्याण विभाग की ओर से पांच लाख रुपये का अनुदान किया गया था. अभी यह सेंटर शिवपुरी स्थित सेवा कुटीर में चलाया जा रहा है. मुक्ता सक्षम उत्पादक समूह के चेयरमैन लाल मो मस्तान बताते हैं कि इस समूह में 14 लोगों का है. ये वे लोग हैं, जिन्होंने पहले ट्रेनिंग ली और अब दूसरों को ट्रेनिंग देते हैं. ट्रेनिंग के दौरान इन्हें जूट का बैग, फोल्डर, फाइल फोल्डर, बोतल रखने वाला बैग, हैंगिंग बैग, स्लिंग बैग आदि बनाना सिखाया जाता है.

10 बजे से शाम पांच बजे तक ट्रेनिंग दी जाती है

यहां ट्रेनर की ओर से सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक ट्रेनिंग दी जाती है. यहां आने वाले कुछ भिक्षुक एक महीने, तो कुछ 2-3 महीने में सारा कुछ सीख जाते हैं. एक दिक्कत यह है कि ट्रेनिंग लेने के बाद भी कुछ ही भिक्षुक इससे जुड़े रहते हैं. हमारे पास एक ठेला भी है, जिसे राशिद लेकर घूमते हैं और उत्पाद को बेचते हैं.

सर्वे के बाद भिक्षुकों को मिलती है ट्रेनिंग

ट्रेनर सुमन कुमारी बताती हैं कि सबसे पहले तो अलग-अलग जगहों, जहां भिक्षुक होते हैं, उन्हें चिह्नित कर सर्वे किया जाता है. सर्वे में उनकी आर्थिक स्थिति, इस पेशे में कैसे आये आदि के बारे में जानकारी ली जाती है और फिर इस पहल के बारे में बताया जाता है. जो इसमें इच्छुक होते हैं, वे यहां पर ट्रेनिंग लेते हैं.

मूख-बधिर भिक्षुक भी बनाते हैं ऑर्डर

2014 में भगत राम और कल्लू राम दोनों इस समूह से जुड़े. ये दोनों मूख-बधिर हैं. समूह से जुड़ने के बाद से वे समूह में मिलने वाले ऑर्डर तैयार करने में योगदान भी देते हैं.

बोली तनु

कोरोना काल में आर्थिक स्थिति ज्यादा खराब हो गयी. इसके बाद मैंने भिक्षा मांगना शुरू किया. पिछले साल सुमन दीदी ने इस पहल के बारे में बताया और मैंने इस समूह से जुड़ी. आज मैंने सुब कुछ बनाना सीख लिया है और अब महीने के पांच हजार रुपये कमा लेती हूं.

-तनु, राजवंशी नगर

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