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मधुसूदन मंदिर में गूंज रहे पारंपरिक होली गीत, देर रात तक फगदोल में उमड़ रहे श्रद्धालु

Updated at : 21 Feb 2026 8:25 PM (IST)
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मधुसूदन मंदिर में गूंज रहे पारंपरिक होली गीत, देर रात तक फगदोल में उमड़ रहे श्रद्धालु

ऐतिहासिक मंदार क्षेत्र इन दिनों होली के रंग में पूरी तरह सराबोर है. यहां स्थित भगवान मधुसूदन मंदिर में पारंपरिक होली गीत-संगीत के माध्यम से श्रद्धालु भगवान को रिझाने में जुटे हैं.

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संजीव पाठक, बौंसी. ऐतिहासिक मंदार क्षेत्र इन दिनों होली के रंग में पूरी तरह सराबोर है. यहां स्थित भगवान मधुसूदन मंदिर में पारंपरिक होली गीत-संगीत के माध्यम से श्रद्धालु भगवान को रिझाने में जुटे हैं. सरस्वती पूजन के बाद से ही ग्रामीण क्षेत्रों में देर रात तक होली गायन का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो पूरे फाल्गुन माह तक भक्ति और उल्लास का वातावरण बनाए रखता है. मंदार क्षेत्र में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह लोक आस्था, परंपरा और सामूहिक भक्ति का विराट उत्सव है. मधुसूदन मंदिर के सामने स्थित फगदोल में प्रतिदिन श्रद्धालु देर रात तक एकत्रित होकर ढोल, मंजीरा और झाल की धुन पर पारंपरिक फाग गाते हैं. भक्ति रस में डूबे ये गीत वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं.

होलिकोत्सव की शुरुआत लगभग एक माह पूर्व हो जाती है. संतों और कीर्तन मंडलियों द्वारा गांव-गांव में होली गीत गाये जाते हैं. संकीर्तन टोलियां भगवान मधुसूदन के दरबार में हाजिरी लगाकर लोक परंपरा को जीवंत बनाए रखती हैं. ग्रामीण अंचलों में समूह बनाकर रातभर फाग गाने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से मंदार क्षेत्र में निभायी जा रही है.

मंदार क्षेत्र में होलिका दहन का है विशेष धार्मिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है. पंडित अवधेश ठाकुर ने बताया कि होलिका दहन के अवसर पर भगवान मधुसूदन का विशेष श्रृंगार किया जाता है. इसके पूर्व देर रात भगवान को छिलका नदी के किनारे ले जाया जाता है. जहां परंपरा के अनुसार होलिका दहन का कार्यक्रम होता है. इस मौके पर यहां पर भगवान के शालिग्राम रूप को ले जाने की परंपरा है. बताया जाता है कि इस वर्ष तीन और चार मार्च को यहां पर होली है. चार मार्च को भगवान को मंदिर के गर्भ गृह से निकाल कर मंदिर के सामने स्थित फगदोल पर बिठाया जाता है. मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं और भक्ति के रंग में रंग जाते हैं. रंग और गुलाल के बीच गूंजते भजन, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप और श्रद्धालुओं की सामूहिक सहभागिता इस उत्सव को अविस्मरणीय बना देती है. मंदार का यह होलिकोत्सव न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है.

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SHUBHASH BAIDYA

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By SHUBHASH BAIDYA

SHUBHASH BAIDYA is a contributor at Prabhat Khabar.

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