पंजवारा में कभी सिंचाई व मछली पालन का बड़ा केंद्र 6.5 एकड़ का तालाब, अब अस्तित्व बचाने की लड़ रहा जंग

Published by : AMIT KUMAR SINH Updated At : 04 Jun 2026 10:32 AM

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Banka News : सरकार जहां जल संरक्षण और जलाशयों के पुनर्जीवन पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं बांका जिले का एक ऐतिहासिक तालाब प्रशासनिक अनदेखी का शिकार होकर धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोता जा रहा है. कभी किसानों और मछुआरों की जीवनरेखा रहा नगरी तालाब आज गंदगी, झाड़ियों और अतिक्रमण की मार झेल रहा है.

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पंजवारा बांका से गौरव कश्यप की रिपोर्ट

Banka News : पंजवारा थाना क्षेत्र के नगरी गांव स्थित नगरी तालाब बदहाली की ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है, जो जल संरक्षण के दावों पर सवाल खड़े करती है. बिहार और झारखंड की सीमा पर स्थित लगभग 6.5 एकड़ क्षेत्रफल में फैला यह तालाब कभी सिंचाई, मत्स्य पालन और पेयजल का प्रमुख स्रोत हुआ करता था. लेकिन वर्षों की उपेक्षा, गाद, बालू और अतिक्रमण ने इसे संकट के मुहाने पर पहुंचा दिया है.

तीन दशक से उपेक्षा का शिकार बना हुआ है तालाब

ग्रामीणों के अनुसार नगरी तालाब पिछले लगभग 30 वर्षों से प्रशासनिक उपेक्षा झेल रहा है. समय पर सफाई और जीर्णोद्धार नहीं होने के कारण तालाब में झाड़ियां उग आई हैं और बड़ी मात्रा में गंदगी जमा हो चुकी है. कई बार ग्रामीणों ने स्वयं सफाई अभियान चलाने का प्रयास किया, लेकिन प्रशासनिक सहयोग नहीं मिलने से प्रयास अधूरे रह गए.

कभी सैकड़ों एकड़ खेतों की प्यास बुझाता था तालाब

एक समय था जब नगरी तालाब क्षेत्र के किसानों के लिए वरदान माना जाता था. तालाब का पानी सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई का मुख्य साधन था. सालभर पानी से भरे रहने के कारण आसपास के गांवों में खेती और पशुपालन को भी काफी लाभ मिलता था. लेकिन अब स्थिति यह है कि तालाब में जल संरक्षण की क्षमता लगातार कम होती जा रही है.

मछली पालन से मिलती थी लोगों को आजीविका

ग्रामीण बताते हैं कि वर्षों पहले बाराहाट अंचल कार्यालय की ओर से तालाब का सैरात डाक होता था और यहां नियमित रूप से मछली पालन किया जाता था. इससे स्थानीय लोगों को रोजगार और आय का साधन मिलता था. तालाब की वर्तमान स्थिति के कारण यह व्यवस्था पूरी तरह ठप हो चुकी है.

बालू और गाद ने बढ़ाई समस्या

ग्रामीणों का कहना है कि हर वर्ष चीर नदी की बाढ़ का पानी तालाब में प्रवेश कर जाता है. इसके साथ बड़ी मात्रा में बालू और गाद भी तालाब में जमा हो जाती है. लगातार बढ़ते इस जमाव के कारण तालाब की गहराई कम होती गई और जल संग्रहण क्षमता प्रभावित हो गई. आज हालत यह है कि तालाब का बड़ा हिस्सा परती जमीन जैसा दिखाई देता है.

भूजल स्तर गिरने से बढ़ी पेयजल की चिंता

स्थानीय लोगों का मानना है कि तालाब की बदहाली का असर भूजल स्तर पर भी पड़ा है. पहले तालाब में वर्षभर पानी रहने से आसपास के क्षेत्रों में जलस्तर संतुलित रहता था, लेकिन अब भूजल स्तर नीचे जाने लगा है. गर्मी के दिनों में कई इलाकों में पेयजल संकट भी देखने को मिलता है.

मुहर्रम पर आज भी आस्था का केंद्र है नगरी तालाब

नगरी तालाब केवल जलाशय ही नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक महत्व भी रखता है. मुहर्रम के अवसर पर बिहार और झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग यहां पहुंचते हैं और ताजिया विसर्जन करते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी जारी है.

अतिक्रमण से भी सिकुड़ रहा तालाब का दायरा

ग्रामीणों ने तालाब पर धीरे-धीरे बढ़ते अतिक्रमण को भी इसकी बदहाली का बड़ा कारण बताया है. उनका कहना है कि यदि समय रहते अतिक्रमण नहीं रोका गया तो आने वाले वर्षों में तालाब का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है.

ग्रामीणों ने उठाई जीर्णोद्धार की मांग

भूदेव मंडल, रवि मंडल, सिप्ती पासवान, टिंकू कुमार मंडल, जितेंद्र पासवान, उज्जवल कापरी, दीपक मंडल, सुगो मंडल, हुरो मंडल, संजय मंडल, अजीत कुमार मंडल, इब्राहिम अंसारी, सुलेमान अंसारी और जमाल अंसारी समेत कई ग्रामीणों ने तालाब के जीर्णोद्धार, अतिक्रमण हटाने और नियमित सफाई की मांग की है. उनका कहना है कि यदि तालाब को पुनर्जीवित किया जाए तो जल संरक्षण, सिंचाई, मत्स्य पालन और रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं.

कहते हैं अधिकारी

बाराहाट के अंचल अधिकारी विकास कुमार ने कहा कि मामला उनके संज्ञान में नहीं है. उन्होंने बताया कि यदि अतिक्रमण या अन्य समस्याओं को लेकर आवेदन प्राप्त होता है तो नियमानुसार जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी.पुनर्जीवन की राह देख रहा ऐतिहासिक तालाबजल संकट और पर्यावरण संरक्षण के दौर में नगरी तालाब का संरक्षण केवल स्थानीय आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत भी है. ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की पहल से यह ऐतिहासिक तालाब एक बार फिर अपनी पुरानी पहचान हासिल कर सकेगा.

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