जिले में सिल्क वस्त्र उद्योग को मिले विस्तार, तो आयेगी खुशहाली

Published at :22 Feb 2016 1:19 AM (IST)
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जिले में सिल्क वस्त्र उद्योग को मिले विस्तार, तो आयेगी खुशहाली

मनोज उपाध्याय बांका : बांका जिले में सिल्क वस्त्र उद्योग के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं. यदि समुचित सरकारी संरक्षण और पर्याप्त बाजार मिले तो जिले में इस उद्योग को नये आयाम मिल सकते हैं. वैसे तमाम शिद्दत और कठिनाईयों के बाद भी सिल्क वस्त्र उद्योग बांका जिले की एक विशिष्ट पहचान है, तो इसका […]

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मनोज उपाध्याय
बांका : बांका जिले में सिल्क वस्त्र उद्योग के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं. यदि समुचित सरकारी संरक्षण और पर्याप्त बाजार मिले तो जिले में इस उद्योग को नये आयाम मिल सकते हैं.
वैसे तमाम शिद्दत और कठिनाईयों के बाद भी सिल्क वस्त्र उद्योग बांका जिले की एक विशिष्ट पहचान है, तो इसका श्रेय उन मेहनतकश बुनकरों को जाता है जिनके पसीने की रंगत उनके ताने पर बुने गये सिल्क के कपड़ों पर साफ दिखाई पड़ती है.
बांका जिले के दो दर्जन से अधिक गांवों के बुनकर सिल्क वस्त्र निर्माण से जुड़े हैं. इनमें अमरपुर प्रखंड के कटोरिया कुमरखाल के अलावा बांका प्रखंड के डांड़ा, देशड़ा, लकड़ीकोला, मनियारपुर, मसुरिया, बाराहाट प्रखंड के धोबिन, बौंसी प्रखंड के डहुआ आदि गांव बुनकर बहुल हैं.
इन गांवों में सिल्क वस्त्र बहुतायत में बनता रहा है. हालांकि हाल के वर्षों में सरकारी उपेक्षा एवं तसर सूत के अभाव में अनेक बुनकर सूती वस्त्र निर्माण की ओर अग्रसर हो गये है. बावजूद तमाम कठिनाईयों के गांव में बने रेशम के वस्त्र आज भी न सिर्फ इस जिले बल्कि सूबे की शान और पहचान हैं. बांका जिले में बने रेशमी वस्त्र भागलपुर के व्यवसायियों के जरिये विदेश तक निर्यात किये जाते हैं. यहां के बने सिल्क वस्त्र खास कर साडि़यां, सूट और चादर की विदेशों में खास मांग हैं.
नाकारा साबित हुई रेशम कीट पालन योजनाएं : जिले में रेश उद्योग को बढ़ावा देने के लिए करीब तीन दशक पूर्व यहां के जंगली इलाकों में रेशम कीट पालन की दो दर्जन योजनाएं शुरू की गयी थी.
आरंभिक दौर में इन योजनाओं को लेकर खूब सरकारी खर्च हुए. एक पृथक विभाग यहां खोला गया जो इन परियोजनाओं की मॉनीटरिंग करता था. लेकिन बीतते समय के साथ ही इन योजना पर लूट और उपेक्षा का ग्रहण लग गया. जिले के कटोरिया, चांदन के आमगाछी, बांका के लकड़ीकोला, बौंसी के श्याम बाजार आदि की परियोजनाएं इस हादसे के जीवंत प्रमाण हैं. इन परियोजना के माध्यम से लक्ष्य यह रखा गया था कि जिले में कीटों के पालन के जरिये कोकून का निर्माण स्थानीय स्तर पर ही होगा. जिससे जिले में सिल्क वस्त्र उद्योग के लिए पर्याप्त रेशम धागे स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो सकेंगे. इनमें ऐरी, तसर, मलवरी, मुगा, मटका, कटिया आदि धागों के निर्माण की योजनाएं सन्निहित थीं.
उम्दा श्रेणी के होते हैं बांका जिले में बने सिल्क वस्त्र : बांका जिले में बन रहे रेशम के कपड़े बेहद उम्दा श्रेणी के होते हैं. लेकिन यहां के बुनकरों को इनके लिए सूत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं हो पाते है. उन्हें भागलपुर और भागलपुर के ही पुरैनी बाजार से रेशम के धागे लाने पड़ते है. डहुआ में कच्चा रेशम लाकर धागा बनाने का भी प्रयोग चल रहा है. हालांकि इस खरीद फरोख्त में बुनकरों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है और कई बार वे ठगे जाते हैं. कुछ वर्ष पूर्व बांका में रेशम सूत बैंक की स्थापना की बात उठी थी. कई बार अधिकारियों और राजनेताओं ने इसके शीघ्र मूर्त्त रूप दिये जाने की घोषणा भी की, लेकिन ये घोषणाएं अब तक पूर्ण नहीं हो पायीं.
बुनकरों की पीड़ा का पारावार नहीं
इस संबंध में बुनकरों की पीड़ा का कोई पारावार नहीं है. चर्चा करते ही वे फुट पड़ते है. डांड़ा, मसुरिया, देशड़ा बुनकर सहयोग समिति के आदिल अंसारी कहते हैं- यदि समुचित सरकारी संरक्षण और पर्याप्त बाजार मिले तो जिले में रेशम उद्योग को चार चांद लग सकता हैं पर फिलहाल ऐसा नहीं है. डांड़ा के बुनकर रजाउर्रहमान ने कहा सूत के लिए उन्हें आज भी भटकना पड़ता हैं.
यदि स्थानीय स्तर पर सूत और बाजार का बंदोबस्त हो तो न सिर्फ यहां के रेशम उद्योग को नया आयाम मिल सकता है बल्कि बुनकर पेशा भी खुशहाल हो जायेगा. लकड़ीकोला के जलील अंसारी तथा देशड़ा के कयूम अंसारी ने कहा रेशम वस्त्र निर्माण से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या पूंजी और बाजार का अभाव है. अगर यह पूरा हो जाय तो जिले में इस उद्योग को नया आयाम मिल सकता हैं.
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