जरूरत पड़ी, तो खून देनेवाला खोजें

Published at :15 Feb 2016 5:44 AM (IST)
विज्ञापन
जरूरत पड़ी, तो खून देनेवाला खोजें

ब्लड बैंक के अभाव में मरीज हो रहे हलकान गंभीर मरीज भी हो रहे रेफर कई बार बनीं योजनायें पर नहीं साकार हो सका ब्लड बैंक स्थापना का लक्ष्य बांका : ब्लड बैंक का अभाव बांका में सम्यक चिकित्सा के मार्ग में एक बड़ा व्यवधान साबित हो रहा है. ऐसे किसी मामले में यहां के […]

विज्ञापन

ब्लड बैंक के अभाव में मरीज हो रहे हलकान

गंभीर मरीज भी हो रहे रेफर
कई बार बनीं योजनायें पर नहीं साकार हो सका ब्लड बैंक स्थापना का लक्ष्य
बांका : ब्लड बैंक का अभाव बांका में सम्यक चिकित्सा के मार्ग में एक बड़ा व्यवधान साबित हो रहा है. ऐसे किसी मामले में यहां के चिकित्सक मरीज को हाथ लगाने से कतराते हैं जिस मरीज के लिए रक्त की जरूरत है. इसका खामियाजा गरीब तबके के मरीजों को भुगतना पड़ रहा है.
11 प्रखंडों और 20 लाख की आबादी वाले बांका जिले में चिकित्सा व्यवस्था की यह दुर्बलता किसी से छिपी नहीं है. लेकिन विभागीय इच्छा शक्ति की कमी और जनप्रतिनिधियों की इस ओर से उदासीनता से यहां स्थिति यथावत बनी हुई है. जब तब ब्लड बैंक की स्थापना को लेकर पहल शुरू की गयी लेकिन वह भी औपचारिक और दिखावा ही साबित हुई. यह सिलसिला 1978 ई. से यहां चल रहा है.
लेकिन तब से लेकर अब तक की इस लंबी अवधि में ऐसा कुछ बुनियादी ढांचा यहां तैयार नहीं हो पाया जिससे प्रसव पीड़ा झेलती किसी मां का जरूरत पड़ने पर सीजेरियन ऑपरेशन भी किया जा सकें . ऐसे मामले आते ही उन्हें यहां के डॉक्टर बाहर रेफर कर देते है. संपन्न लोगों के लए तो यह बहुत मायने नहीं रखता, लेकिन गरीब तबके के लोगों के लिए यह स्थिति जान पर बन आती है.
हद तो यह है कि बांका में जिलास्तरीय सदर अस्पताल है.
सरकार, जनप्रतिनिधि, जिला प्रशासन और विभागीय अधिकारी इस अस्पताल में जरूरत से ज्यादा मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध होने का बार-बार दावा करते हैं. लेकिन यहां जरूरत पड़ने पर एक अदद बोतल खून किसी मरीज को नहीं मिल सकता, इस सवाल का कोई जवाब उनके पास नहीं होता. करीब साल भर पूर्व इसी अस्पताल के एक कमरे में अस्थायी तौर पर फ्रीजर के सहारे एक छोटा ब्लड बैंक चालू किया गया, लेकिन संसाधनों के अभाव में देखते ही देखते इसे बंद भी कर दिया गया. इस पहल से कितने मरीजों को लाभ मिला इस बात का इल्म विभागीय अधिकारियों को भी नहीं हैं.
वर्ष 1979 में तत्कालीन एसडीओ विजय कपूर ने यहां रेड क्रास की इकाई स्थापित कर इसी के अधीन एक व्यवस्थित ब्लड बैंक की स्थापना का पहल शुरू किया. आरंभिक दौर में कमेटी गठित हुई, राशि भी एकत्रित की गयी और स्थानीय कोषागार के समीप एक भवन निर्माण का कार्य भी शुरू किया गया. आश्चर्य है कि तीन किस्तों में लाखों की राशि व्यय करने के बाद भी यह भवन आज तक बन कर पूरा नहीं हो सका. नतीजतन ब्लड बैंक की कल्पना यहां हवा में ही रह गयी.
दरअसल विजय कपूर के यहां से तबादले के साथ ही इस योजना को ग्रहण लग गया. सिर्फ यही नहीं फरवरी 2010 के पूर्व स्थानीय अनुमंडलीय अस्पताल परिसर में दो कमरे का एक भवन बनवाकर इसे ब्लड बैंक का स्वरूप देने की बात कही गयी. लाखों के उपकरण भी इस निमित्त यहां मंगवाये गये. बाद में उन उपकरणों को कहीं अन्यत्र गोदाम में रख दिया गया या फिर उन्हें निजी उपयोग में लगा दिये गये. अलबत्ता निर्मित भवन को पहले तो दवा गोदाम और फिर बाद में एचआइवी परामर्शी केंद्र बना दिया गया. और यहां भी ब्लड बैंक का सपना छू मंतर हो गया.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन