पुतुल के मैदान में उतरते ही बांका की लड़ाई हो गयी त्रिकोणात्मक, जयप्रकाश नारायण यादव को माई समीकरण पर है भरोसा
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :28 Mar 2019 6:14 AM (IST)
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सुभाष बैद्य बांका : महागठबंधन की ओर राजद प्रत्याशी जयप्रकाश नारायण और एनडीए के जदयू उम्मीदवार गिरिधारी यादव के बीच में भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष पुतुल कुमारी के निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतर जाने से यहां का मुकाबला त्रिकोणात्मक हो गया है. मौजूदा सांसद जयप्रकाश नारायण यादव माई समीकरण पर अपनी […]
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सुभाष बैद्य
बांका : महागठबंधन की ओर राजद प्रत्याशी जयप्रकाश नारायण और एनडीए के जदयू उम्मीदवार गिरिधारी यादव के बीच में भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष पुतुल कुमारी के निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतर जाने से यहां का मुकाबला त्रिकोणात्मक हो गया है. मौजूदा सांसद जयप्रकाश नारायण यादव माई समीकरण पर अपनी पकड़ मजबूत बनाये हुए हैं.
गिरिधारी यादव यहां से दो बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं और वर्तमान में बेलहर के विधायक हैं. उन्हें पुराने अनुभव का लाभ मिल सकता है. जेपी के वोट बैंक पर कितनी सेंधमारी गिरिधारी कर सकते हैं, इसी पर परिणाम टिका हुआ है. इधर, पुतुल कुमारी निर्दलीय जरूर हैं, लेकिन दोनों ही प्रमुख प्रत्याशी इसे हल्के में लेने की कतई भूल नहीं कर सकते हैं.
बांका का सियासी मैदान शुरू से ही दिलचस्प रहा है. 2009 में बांका एक बड़े घटनाक्रम से गुजर चुका है. उस बार दिग्विजय सिंह निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे थे.
तत्कालीन सांसद गिरिधारी यादव का टिकट राजद से कट गया था और कांग्रेस से वे मैदान में थे, जबकि राजद से पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव आये. इस चुनाव में दिग्विजय सिंह की बड़ी जीत हुई. राजनीतिक टीकाकारों की मानें तो उम्मीदवारों की घोषणा से पहले दो तरफे की लड़ाई स्पष्ट दिख रही थी, लेकिन अब यह त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ चला है.
आधी आबादी का रहा है बोलबाला
1952 में सुषमा सेन बंगाल से आकर बांका की सांसद बनीं. इसके बाद 1957 व 1962 शकुंतला देवी यहां की सांसद रहीं. 1986 में मनोरमा सिंह व 2010 में पुतुल कुमारी महिला सांसद की रूप में यहां जीत हासिल कर चुकी हैं. एक समय बांका लोकसभा पर कांग्रेस का सिक्का जमा हुआ था. मनोरमा सिंह के बाद ही कांग्रेस के हाथ से बांका की सियासी जमीन खिसक गयी और हाल तक जदयू व राजद के पाले में यहां की सत्ता रही.
राजनारायण व जाॅर्ज हार चुके हैं चुनाव
बांका लोस से राजनारायण और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे कद्दावर नेताओं की हार हो चुकी है. 1980 में चंद्रशेखर सिंह यहां के सांसद हुए. 1989 के चुनाव में जनता पार्टी की ओर से प्रताप सिंह ने जीत दर्ज की. 1991 में प्रताप सिंह दोबारा जीते. इसके बाद 1996 में गिरिधारी यादव निर्दलीय चुनाव जीते. गिरिधारी यादव 2004 में दोबारा सांसद बने. दिग्विजय सिंह 1998, 1999 व 2009 में तीन बार संसद पहुंचे.
नये परिसीमन में बांका संसदीय क्षेत्र में धोरैया व सुल्तानगंज विधानसभा जुड़ गया. वर्तमान में छह विधानसभा क्षेत्र हैं.1.अमरपुर 2.कटोरिया 3.बांका 4.बेलहर 5.धोरैया 6.सुल्तानगंज .(बांका का धोरैया (अनुसूचित जाति) व कटोरिया (अनुसूचित जन जाति) विधानसभा सुरक्षित सीट है.)
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