यहां दहेज लेना पाप, दोषियों को मिलती है कड़ी सजा, चौंका देगी औरंगाबाद की यह कहानी

Published by : Sakshi kumari Updated At : 15 May 2026 7:59 AM

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प्रतीकात्मक तस्वीर

इतना ही नहीं, दहेज लेने वालों के लिए सामाजिक दंड का भी प्रावधान है.यह समाज आज उन लोगों को आईना दिखा रहा है, जिनके यहां बेटे की बारात बिना दहेज के नहीं निकलती.

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Aurangabad News: (सुजित कुमार) जिले के मदनपुर प्रखंड के दक्षिणी इलाके में बसे भोक्ता समाज ने दहेज जैसी सामाजिक कुरीति के खिलाफ अनोखी मिसाल पेश की है. बादम, पिछुलिया, अम्बावार, कनौदी, सहजपुर, लंगूराही, बाबुबांध, रामाबांध, पीतांबरा और मनवादोहर सहित कई गांवों में दहेज लेना और देना दोनों पाप माना जाता है.

दहेज लोभियों को आईना दिखा रहा भोक्ता समाज

इतना ही नहीं, दहेज लेने वालों के लिए सामाजिक दंड का भी प्रावधान है.यह समाज आज उन लोगों को आईना दिखा रहा है, जिनके यहां बेटे की बारात बिना दहेज के नहीं निकलती. आर्थिक रूप से पिछड़े होने के बावजूद यहां के लोगों की सोच काफी प्रगतिशील मानी जाती है.

गांव में दहेज प्रथा पूरी तरह वर्जित

पहाड़ की गोद में बसे इन गांवों के लोग पतल और ओड़िया बनाकर अपना जीवन यापन करते हैं. यहां तैयार होने वाले पतल और ओड़िया आसपास ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के इलाकों तक भेजे जाते हैं. सीमित संसाधनों में खुशहाल जीवन जीने वाले भोक्ता समाज के लोगों ने कभी किसी बेटी पक्ष से दहेज नहीं मांगा और न ही दिया.

बिना दहेज की होती है विवाह

ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा आजादी से पहले से चली आ रही है. भोक्ता समाज करीब 200 वर्षों से बिना दहेज विवाह की परंपरा का पालन कर रहा है. समाज के बुद्धिजीवी हर वर्ष गांव में पीपल के पेड़ के नीचे सम्मेलन करते हैं, जहां सामाजिक बुराइयों को खत्म करने और शिक्षा को बढ़ावा देने पर चर्चा होती है.

200 साल पहले शुरू हुई थी पहल

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि विवाह को केवल दो परिवारों और दो दिलों को जोड़ने वाला पवित्र बंधन माना जाता है. इसी सोच के तहत समाज के पूर्वजों ने करीब 200 साल पहले यह निर्णय लिया था कि दहेज न लिया जाएगा और न दिया जाएगा.

दहेज लेना सामाजिक दंड

पूर्व जिला पार्षद प्रतिनिधि मथुरा सिंह भोक्ता ने बताया कि यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है. वहीं शिक्षक शिवध्यान सिंह भोक्ता ने कहा कि दहेज लेने वालों के लिए सामाजिक दंड का प्रावधान जरूर है, लेकिन आज तक किसी को दंडित करने की नौबत नहीं आई.

सादगी से होती है शादी

भोक्ता समाज में विवाह के दौरान सभी पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं, लेकिन फिजूलखर्ची और तामझाम से दूरी रखी जाती है. सामान्य तरीके से प्रीतिभोज का आयोजन होता है. समाज में लड़के वाले ही लड़की की तलाश करने जाते हैं और दोनों परिवार आपसी सहमति से विवाह तय करते हैं.

शिक्षा से बदली समाज की सोच

भोक्ता समाज में अब बाल विवाह की प्रथा भी लगभग समाप्त हो चुकी है. शिक्षक कौलेश्वर सिंह भोक्ता बताते हैं कि पहले शिक्षा की कमी के कारण कम उम्र में ही बच्चों की शादी कर दी जाती थी, लेकिन अब लोग शिक्षा के प्रति जागरूक हो चुके हैं.उन्होंने बताया कि अब लड़के और लड़कियों की शादी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद 18 से 21 वर्ष की आयु के बाद ही की जाती है. समाज में अब विवाह वर-वधू की योग्यता के आधार पर तय होता है.

बेटियों को नहीं मानते बोझ

ग्रामीण महिला बबीता देवी ने कहा कि गरीब परिवार से होने के बावजूद समाज की पुरानी परंपरा के अनुसार ही बेटियों की शादी होती है. दोनों पक्ष एक-दूसरे के घर जाकर बच्चों की योग्यता देखते हैं और उसी आधार पर रिश्ता तय किया जाता है. लालमुनी देवी ने कहा कि दहेज के कारण कई परिवार कर्ज में डूब जाते हैं और कई बेटियां दहेज उत्पीड़न का शिकार होती हैं. ऐसे में समाज की यह परंपरा बेहद गर्व की बात है.

दहेज लेने वालों का होता है बहिष्कार

संजय सिंह भोक्ता ने बताया कि अगर कोई व्यक्ति दहेज लेकर शादी करता है तो उसके परिवार में समाज की लड़की की शादी नहीं की जाती है. वहीं शिवनंदन सिंह भोक्ता ने कहा कि यहां लड़के वाले भी शादी में लड़की पक्ष की आर्थिक मदद करते हैं, चाहे वह अनाज के रूप में हो या अन्य किसी माध्यम से.राजकुमार सिंह भोक्ता ने बताया कि यदि कोई दहेज लेने का दोषी पाया जाता है तो पंचायत बैठती है और उसे दंड दिया जाता है. दोषी को समाज से बहिष्कृत भी किया जा सकता है. हालांकि बाद में सुधार का मौका भी दिया जाता है. उन्होंने कहा, “बेटियां हमारा अभिमान हैं. हम दहेज देकर दामाद नहीं खरीदेंगे.”

समाज में कोई बेटी नहीं रहती अविवाहित

ग्रामीणों का कहना है कि समाज में बेटियों को कभी बोझ नहीं माना जाता. लोग दहेज के लिए पैसे जोड़ने के बजाय बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देते हैं. अपनी क्षमता के अनुसार बेटी-दामाद को उपहार दिए जाते हैं, लेकिन किसी प्रकार का दबाव नहीं होता. यही वजह है कि समाज में कोई भी बेटी अविवाहित नहीं रहती है.

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Sakshi kumari

लेखक के बारे में

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साक्षी देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की धरती सीवान से आती हैं. पत्रकारिता में अपनी करियर की शुरुआत News4Nation के साथ की. 3 सालों तक डिजिटल माध्यम से पत्रकारिता करने के बाद वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल के साथ कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. बिहार की राजनीति में रुचि रखती हैं. हर दिन नया सीखने के लिए इच्छुक रहती हैं.

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