व्यवस्था को आईना : इस गरीब के घर रोज नहीं जलता चूल्हा

Published at :14 Jan 2016 6:59 AM (IST)
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व्यवस्था को आईना : इस गरीब के घर रोज नहीं जलता चूल्हा

देवकुंड (औरंगाबाद) : देश में आज भी मजदूर दिवस मनाया जाता है. गरीबों को इससे कोई सरोकार भी नहीं कि उनकी मजबूरी भी देश में दिवस के रूप में मनायी जाती है. क्योंकि उनकी जो स्थिति वर्षों पहले थी. वह आज भी बरकरार है, सरकार मजदूर दिवस मना कर उन गरीबों को जख्म पर नमक […]

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देवकुंड (औरंगाबाद) : देश में आज भी मजदूर दिवस मनाया जाता है. गरीबों को इससे कोई सरोकार भी नहीं कि उनकी मजबूरी भी देश में दिवस के रूप में मनायी जाती है. क्योंकि उनकी जो स्थिति वर्षों पहले थी. वह आज भी बरकरार है, सरकार मजदूर दिवस मना कर उन गरीबों को जख्म पर नमक छिड़कती है, जो गरीब अन्न के एक-एक दाने के लिए मुहताज बने हुए हैं. उनके असहाय बच्चों को न तो शिक्षा ही मिल पाती है ना ही भरपेट भोजन ही मिलता है.
जी! हां हम आपको एक ऐसी ही गरीबी की दांस्ता को लेकर आये है, यह कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है. गोह प्रखंड के डिहुरी गांव का उन बेसहारा परिवार का. इसकी खबर जैसे ही प्रभात खबर को मिली वहां जाने के बाद हकीकत सामने आयी.
गोह प्रखंड के डिहुरी निवासी उपेंद्र यादव अपनी पत्नी खुशबू देवी, संतान रंजन कुमार, रिंकी कुमारी, रंजीत कुमार व संजीत कुमार के किसी तरह गरीबी को झेलते हुए मजदूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण करता था. पत्नी भी बीमार रहती थी. वर्ष 2011 में पत्नी खुशबू इस दुनिया से चल बसी. चारों बच्चे मां के बिना रोते-बिलखते इधर-उधर चलते थे. उपेंद्र मजदूरी कर किसी तरह अपने बच्चों को पाल पोस रहा था.
इसी बीच 2014 में वह भी पोलियो का शिकार हो गया, जिससे वो भी चलने -फिरने में असर्मथ हो गया. उपेंद्र अब लाठी के सहारे गांव में ही भीख मांग कर अपने बच्चे को परवरिस कर रहा है. जब घर में एकाध किलो चावल रहता है तो खाना बनता है, नहीं रहता है तो बच्चे के साथ उपेंद्र अपने भाग्य को कोसते हुए भूखे पेट सो जाता है. जब उपेंद्र से पूछा गया कि बच्चे को कैसे खिलाते-पिलाते हैं तो वह कहा बाबू एको कट्ठा खेत ना हे, पत्नी चार साल पहिले दुनिया से चल बसल, पत्नी के मरने के बाद हम मजदूरी करके कइसहु लइकवन के पाल पोसहली.
लेकिन भगवान के उहो न देखल गेलइ. हमरा पोलियो मार देलक कइसहु भीख मांगके लइकवन के खियावही ना मिलहे तब लइकवन रोइत रोइत सुत जा हइ. कहते -कहते फफक कर रोने लगा. रोने की आवाज से प्रभात खबर के प्रतिनिधि ने उससे कुछ पैसे खाने के लिए दिये, इसे देखकर मौके पर मौजूद डिहुरी पंचायत के मुखिया पति ने 500 रुपया खाने को दिये.
इतनी गरीबी होने के बावजूद भी इस ओर न तो जनप्रतिनिधि का ही ध्यान है ना ही सरकार का. अगर ध्यान रहता तो इन्हें बीपीएल सूची से वंचित नहीं होना पड़ता. इनको रहने के लिए इंदिरा आवास जरूर मिलता. वृद्धापेंशन का लाभ भी मिलता. लेकिन आज तक इस परिवार को कोई भी सरकारी योजना का लाभ नहीं दिया जाता है. जरूरत है उपेंद्र के पूरे परिवार की देखरेख व सरकारी लाभ दिलाने की,ताकि उनके बच्चे पढ़ लिख कर कुछ आगे कर सकें.
व्यवस्था में दोष है, करेंगे पहल
जानकारी मिलने के बाद में जो यहां के बीडीओ के प्रभार में सीओ हैं उनको जानकारी दी गयी है. साथ ही योजना का लाभ नहीं मिलने पर उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया है. सरकार की आेर से फूड सेफटी बिल लागू है.
पोषाहार के कई कार्यक्रम चल रहे हैं. सरकार की इस योजनाओं के बावजूद भी अगर समाज में इस तरह का उदाहरण आ रहा है तो यह व्यवस्था का दोष है. इस पर पहल की जायेगी.
मनोज कुमार शर्मा ,विधायक
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