चल्हिकी बिगहा में दिख रहा है औषधीय फसल की ओर रुझान

Published at :21 Nov 2015 6:59 PM (IST)
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चल्हिकी  बिगहा में दिख रहा है औषधीय फसल की ओर रुझान

चिल्हकी बिगहा में दिख रहा है औषधीय फसल की ओर रुझानस्ट्राॅबेरी की खेती बना उन्नति का आधार चिल्हकी के अलावा नरहर अंबा के भी किसान स्ट्राॅबेरी से जुड़े (फोटो नंबर-3,4) परिचय- चिल्हकी बिगहा में लगाया गया अष्ट्राबेरी का पौधा, सिंचाई के मेढ़ पर ड्रिप पाइप लगाते किसान अंबा (औरंगाबाद) उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच चाकरी, […]

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चिल्हकी बिगहा में दिख रहा है औषधीय फसल की ओर रुझानस्ट्राॅबेरी की खेती बना उन्नति का आधार चिल्हकी के अलावा नरहर अंबा के भी किसान स्ट्राॅबेरी से जुड़े (फोटो नंबर-3,4) परिचय- चिल्हकी बिगहा में लगाया गया अष्ट्राबेरी का पौधा, सिंचाई के मेढ़ पर ड्रिप पाइप लगाते किसान अंबा (औरंगाबाद) उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच चाकरी, भिख निदान की कहावत अंबा के चिल्हकी बिगहा में चरितार्थ होते देखने को मिल रही है. आज भी यहां किसान नौकरी के बजाय खेती करना बेहतर समझ रहे हैं. गांव में जाते ही इनका जज्बा देखने को मिलता है. गांव के चारों ओर भिन्न-भिन्न तरह की सब्जी व औषधीय खेती की जा रही है. खेत के छोटे-मोटे टुकड़े होने के बावजूद भी यहां के किसान अपने मेहनत के बदौलत लाखों की आमदनी कर खुशहाल हैं. पिछले वर्ष गांव के किसान बृज किशोर ने 16 कट्ठा में स्ट्राॅबेरी की खेती की थी. बृज किशोर के अनुसार चार माह की इस खेती में 70 हजार रुपये खर्च हुए थे, जबकि साढ़े तीन से चार लाख रुपये आमदनी हुई थी. उनकी खेती को देख कर इस वर्ष गांव के रघुपत मेहता व नरहर अंबा के अवधेश मेहता, कृष्णा मेहता व शिव नारायण मेहता ने दो एकड़ में स्ट्राॅबेरी के पौधे लगाये हैं. किसान बताते हैं कि 25 अक्तूबर को पौधे लगाये थे. खेतों में पौधे लगाये मात्र 25 दिन ही हुए हैं और उसमें फल निकलना शुरू हो गया. रघुपत ने बताया कि अभी इसका बाजार भाव 600 रुपये किलो के लगभग है.इस बार पुना से लाया स्ट्राॅबेरी के पौधे पिछले वर्ष यहां स्ट्राॅबेरी के मात्र एक वेराइटी की खेती की गयी थी, जिसे बृज किशोर ने हरियाणा के हिसार से लाया था. इस वर्ष रघुपत व उनके साथ खेती करनेवाले अन्य किसानों ने पुना के महाबालेश्वर से पौधे लाये हैं. उन्होंने बताया कि इंटरनेट के माध्यम से हमलोगों को इसकी जानकारी मिली. इस बार यहां स्वीट चार्ली, कैमा रोजा, इन्टाडोन जैसे तीन वेराइटी के पौधे लगाये गये हैं. उन्होंने बताया कि स्वीट चार्ली सबसे बेहतर फल देने वाला प्रजाति है. सात लाख खर्च पर 20 लाख आमदनी की उम्मीदरघुपत ने बताया कि पुना के महाबालेश्वर से पौधा लाकर खेतों में लगाने व सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम सेट करने तक चार लाख खर्च हुए हैं. उन्होंने फसल के आखिरी समय तक तीन लाख और खर्च होने का अनुमान जताया है. आय के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि बेचने के लिए बाजार की समस्या है. अगर अच्छा बाजार मिला तो तकरीबन 20 से 22 लाख रुपये आमदनी होने की उम्मीद है.हेक्टेयर में तीन टन तक होती है उपज स्ट्राॅबेरी की उपज एक हेक्टेयर में 30 टन से अधिक होती है. इसकी जानकारी देते हुए खेती से जुड़े किसानों ने बताया कि हरियाणा के किसानों द्वारा स्ट्राॅबेरी की उपज की मात्रा तीन टन प्रति हेक्टेयर सुन कर हम सोचने को विवश हो गये. इतनी लाभ प्रद खेती से हम अब तक दूर है और इसी कारण बिहार अन्य राज्यों की तुलना में कृषि क्षेत्र में भी पिछड़ेपन का दंश झेल रहा है.पॉली हाउस में तैयार किये जाते हैं पौधेगांव में पॉली हाउस भी लगाया गया है, जिसमें विपरीत मौसम में भी सब्जी व औषधीय फसल की खेती की जाती है. पॉली हाउस में ही स्ट्राॅबेरी के पौधे तैयार किये जाते हैं. किसानों के लिए काफी लाभप्रद है. इसमें किसी भी मौसम में कोई फसल का उत्पादन किया जाता है. इसे लगवाने में कृषि विभाग द्वारा बड़े पैमाने पर अनुदान भी दी जाती है. बेमौसमी फल व सब्जी का उत्पादन कर किसान अधिक दाम पर अपनी उत्पादित फसल को बेच कर लाभ ले सकते हैं.फसल उगाने की विधि : औषधीय फसल स्ट्राॅबेरी को लगाने में थोड़ी सतर्कता बरतनी पड़ती है. लगाते समय बेड की तैयारी लगभग ढ़ाई फुट की दूरी पर की जाती है. बेड के निर्माण के बाद एक सीधी पंक्ति में एक से डेढ़ फुट की दूरी पर पौधे को लगाया जाता है. पंक्तियों में लगाने के पहले काले प्लास्टिक को बेड पर इस कदर ढका जाता है कि उसके अंदर का बेकार तत्व नष्ट हो जाये और पौधे को आवश्यक तत्व मिलता रहे. काला प्लास्टिक ब्लीचिंग से स्ट्राॅबेरी का फल को कीट पतंगों से भी बचाव होता है. खेतों में उत्पादन की क्षमता बनाये रखने के लिए जैविक खाद व डीएपी का इस्तेमाल किया जाता है. जब पौधे विकसित होते हैं तो प्लास्टिक ब्लीचिंग के ऊपर फैलने लगता है. स्ट्राॅबेरी का फूल उजले रंग का होता है, जो काफी आकर्षक दिखता है.सिंचाई का साधन : स्ट्राबेरी का पटवन कृषि उपकरण माइक्रो द्वारा बेड बना कर किया जाता है. इस प्रक्रिया के दौरान पौधे तैयार करने में छह महीने का समय लगता है. जब पॉली हाउस में पौधे तैयार हो जाते हैं तब ही वे बाहरी वातावरण को झेलने के लायक बनते हैं. खेत में लगाये जाने के बाद भी माइक्रो व स्पीकंलर के फुहारे से ही इसकी सिंचाई की जाती है.कितना उपयोगी हैं स्ट्राॅबेरी : विशेषज्ञों के अनुसार स्ट्राॅबेरी में प्रचुर प्राकृतिक पोषक तत्व मौजूद हैं, जो कई प्रकार के रोगों से बचाने के साथ ही स्वास्थ्य को ठीक रखने में सहायक है. इससे बनने वाले औषधीय उत्पादों की मांग आज सबसे अधिक है. बाजार में हर्बल वाइन फेश वाश, फशियल किट, मिनी विटामिन इ किट,स्ट्राॅबेरी आलमॉन्ड फेशियल, फ्रूट ब्लीच, स्कीन व्हाइटनिंग किट नाम से स्ट्राॅबेरी के सैकड़ों सामग्री बिक रहे हैं, जिसका बाजार में दिन प्रतिदिन मांग बढ़ती जा रही है. ऐसी स्थिति में इसकी खेती से बाजार में मांग के अनुरूप किसानों को अत्यधिक लाभ होगा.क्या राय है कृषि विशेषज्ञों कास्ट्राॅबेरी औषधीय पौधा है, जिससे कई प्रकार के औषधि का निर्माण होता है. इसका उपयोग खाद्य पदार्थों में भी किया जाता है. इसमें मानव को स्वच्छ बनाये रखने के लिए कई प्रकार के विटामिन पाया जाता है. बिहार में इसकी खेती बड़े पैमाने पर नहीं हो रही है. पर इसका बाजार मूल्य काफी ऊंचा है. ग्रामीण क्षेत्र के बाजार में एक किलो स्ट्राॅबेरी का मूल्य 80 से 100 रुपये प्रति किलो है. जबकि कंपनी इसे अधिक मूल्य देकर खरीदती है. अगर इसकी खेती प्रचुर मात्रा में की जाये तो कृषि के लिए यह उपयोग व वरदान साबित हो सकता है.डाॅ नित्यानंद, समन्वयक व डाॅ राजीव कुमार कृषि वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र सिरिस, औरंगाबाद

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